अनुच्छेद 370 हटने के बाद के दो सालों का निचोड़ है कि अमित शाह फेल हो रहे हैं। घाटी में खौफ घटता हुआ है और जमीनी हकीकत जस की तस है। इन सवालों का रत्ती भर जवाब नहीं है कि घाटी में भारत के लोग जमीन खरीदते हुए, होटल-रिसोर्ट बनाते हुए, पर्यटन काम धंधे शुरू करते हुए क्यों नहीं हैं? क्या कश्मीरी पंडित वापिस घर लौटे? क्या घाटी में हिंदुओं की प्रॉपर्टी, मंदिरों के खंडहर और जमीन मुस्लिम कब्जे से मुक्त हुए? क्या आम हिंदू, आम भारतीय के लिए घाटी भयमुक्त बनी है? घाटी अलगाव और इस्लामियत का घेटो है या कश्मीरियत में लौट रहा इलाका? वहा हिंदुस्तानियत की संभावना है या तालिबानियत की? Truth of Kashmir Valley
कश्मीर घाटी का सत्य-19: बहुत त्रासद है यह लिखना कि कश्मीर घाटी में मुस्लिम-हिंदू साझा रिहायश बनवाने (या उसकी शुरुआत नहीं होना, एजेंडा तक नहीं बनना) के पहलू में काम जीरो है। सोचें, कैसा शर्मनाक सत्य है जो दो सालों में भारत के दो लोगों ने भी (हिंदुओं ने) घाटी में जमीन नहीं खरीदी! संसद में हुए सवाल पर दो लोगों के जमीन खरीदने का जब जवाब मिला तो बीबीसी वेबसाइट ने पड़ताल करके बताया कि ये दो लोग भी जम्मू क्षेत्र के हैं!
इसका क्या अर्थ है? कह सकते हैं मोदी सरकार और अमित शाह को जो करना था वह कर दिया और क्या करें! आखिर अनुच्छेद 370 खत्म कर दी। 35ए खत्म कर दिया। राज्य की सीमाएं बदल दी। दर्जा बदल गया। अगले साल विधानसभा चुनाव हो जाएंगे। फिलहाल विधानसभा क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन हो रहा है। बहुत संभव है सियासी चतुराई से अमित शाह चुनाव के बाद जम्मू कश्मीर में हिंदू मुख्यमंत्री की शपथ करवा दें। इससे भाजपा की देश में वाहवाही बनेगी। भक्त हिंदू तब 2024 के लोकसभा चुनाव में हिंदुओं को मूर्ख बनाने के लिए हल्ला करते हुए झूमेंगे कि श्रीनगर में हिंदू मुख्यमंत्री! मोदी है तो सब मुमकिन है!
कश्मीर घाटी का सत्य-18 : घाटी है भारत और शाह की परीक्षा
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पर इससे घाटी की इस्लामियत को तालिबानियत की हवा लगेगी या रूकेगी? कल्पना करें विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा के जितेंद्र सिंह श्रीनगर में मुख्यमंत्री पद की शपथ लें तो वह कश्मीर समस्या का समाधान होगा या पानीपत की कथित तीसरी लड़ाई के लिए कश्मीर घाटी को रणक्षेत्र बनवाना होगा? ऐसे चुनाव और हिंदू मुख्यमंत्री की जगह तो श्रीनगर में उप राज्यपाल की हुकूमत बनवाए रखना अधिक उपयोगी है। केंद्र के सीधे शासन के जरिए क्या पहले हिंदू पंडितों, हिंदुओं की वापसी, आबादी की बुनावट को बदलने का काम वहां प्राथमिकता से नहीं होना चाहिए? देश में भक्त हिंदुओं में नैरेटिव बनवाना मकसद है या घाटी के जिलों में, जमीन पर हिंदुओं को वापिस बसाना है? जब हिंदुओं के असंख्य घर, मंदिर सब घाटी में अभी भी लावारिस व खाली पड़े हैं तो उन्हें आबाद बनाने का काम क्या अनुच्छेद 370 के खत्म होने के बाद प्राथमिकता से नहीं होना था? इसके बजाय झूठ, प्रोपेगेंडा से घाटी में जन्माष्टमी के दिन झांकी के पोस्ट प्रचारित करके क्या मिलेगा? क्यों घाटी के बाहर के हिंदू को इस झूठ में बहलाना जरूरी है कि श्रीनगर, अनंतनाग आदि में हिंदू का जीना संभव और पहले जैसा! तभी आज का जाहिराना यह सत्य है जो असलियत को दबा कर, प्रतीकात्मक फोटो, प्रचार से घाटी की सच्चाई से मुंह मोड़ना जस का तस जारी है।
कश्मीर घाटी का सत्य-17: घाटी है सवालों की बेताल पचीसी!
निश्चित ही अनुच्छेद 370 की समाप्ति ब्रह्मास्त्र था। इसका घाटी में भारी मनोवैज्ञानिक असर हुआ। अलगाववादी और जिद्दी लोगों की गलतफहमी दूर हुई कि दिल्ली की सरकार में दम नहीं है। उसमें अनुच्छेद 370 हटाने जैसे फैसलों की हिम्मत नहीं है! उस दिन एक और बात साबित हुई। दहशत में लोग सड़कों पर निकलने का साहस नहीं जुटा पाए। निश्चित ही उस दिन सुरक्षा बल बड़ी तादाद में तैनात था लेकिन वह तो घाटी में हमेशा तैनात रहा है, जबकि श्रीनगर में पत्थरबाजी, प्रदर्शन, हिंसा रूटिन की बात है। माना जाता है कि पांच अगस्त 2019 के दिन दिल्ली में गृह मंत्रालय से ले कर सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल सभी आंशका में थे कि श्रीनगर में लोग जब सड़कों पर निकलेंगे तो कैसे संभालेंगे। अजित डोवाल श्रीनगर जा कर बैठे भी। लेकिन कुछ नहीं हुआ। घाटी में लोग दुबके रहे। उस सच्चाई में ही अपनी थ्योरी है कि कश्मीरी मुसलमान कुल मिलाकर कश्मीरी पंडितों के वंशज हैं। यदि आईएसआई की स्थायी साजिश, ट्रेनिंग और पैसे का खेल नहीं होता तो हिंदुओं की जात-पांत में बंटा कश्मीरी मुसलमान (हां, यह भी सत्य) भी इस्लामियत के बावजूद वहीं कलेजा लिए हुए है जो कश्मीरी पंडित का है।
उस नाते श्रीनगर में प्रशासन के पास अब भी खौफ बनवाने वाला यह मैसेज है कि जान लो अब अनुच्छेद 370 नहीं है। सो, श्रीनगर, घाटी में भी वैसे ही राज होगा जैसे चंडीगढ़, जयपुर, शिमला में है। मतलब जम्मू से जवाहर टनल के रास्ते शेष भारत के लोग घाटी में जा कर बसेंगे। घाटी में बाहर के लोगों को जमीन आवंटन, कश्मीरी पंडितों, हिंदुओं को बसाने, निवेश करवाने, उन्हें टेंडर देने, काम-धंधे, कारखाने खुलवाने का काम होगा? यह एप्रोच अनुच्छेद 370 हटने के तुंरत बाद अपना लेनी चाहिए थी। घाटी बाहर के उद्यमियों, डवलपरों, होटल-पर्यटन के नामी ब्रांडों, व्यापारियों और बिहार-झारखंड-यूपी-बंगाल-ओड़िशा से कामगारों का श्रीनगर में सैलाब बनवा देना था। यदि दो वर्ष में दो हजार प्रोजेक्ट, धंधे, हिंदू व्यापारी या मजदूर घाटी में काम करने के लिए पहुंचते तो आंतकी-अलगाववादी अपने आप यह सोचते हुए लाचार बनते कि वे इतने लोगों को कैसे टारगेट बनाएं? तब वे डर और मजबूरी में हालातों से समझौता करते हुए होते। लेकिन आज क्या स्थिति है? वे श्रीनगर में चंद पुराने हिंदुओं पर भी आतंकी हमले का बार-बार भय बनवाते हुए हैं और बाहर से लोगों के आने देने का माहौल नहीं बनने दे रहे हैं। सुरक्षा बल और प्रशासन सब बार-बार लगातार अपनी और चंद हिंदुओं की सुरक्षा में फंसे हुए हैं।
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कश्मीर घाटी का सत्य-16: नब्बे का वैश्विक दबाव और नरसिंह राव
इसलिए अनुच्छेद 370 हटने के बाद के दो सालों का निचोड़ है कि अमित शाह फेल हो रहे हैं। घाटी में खौफ घटता हुआ है और जमीनी हकीकत जस की तस है। इन सवालों का रत्ती भर जवाब नहीं है कि घाटी में भारत के लोग जमीन खरीदते हुए, होटल-रिसोर्ट बनाते हुए, पर्यटन काम धंधे शुरू करते हुए क्यों नहीं हैं? क्या कश्मीरी पंडित वापिस घर लौटे? क्या घाटी में हिंदुओं की प्रॉपर्टी, मंदिरों के खंडहर और जमीन मुस्लिम कब्जे से मुक्त हुए? घाटी की ब्यूरोक्रेसी से उन पटवारियों, तहसीलदारों, थानेदारों आदि को चिन्हित करके क्या हटाया जा सका जो गुल शाह सरकार से लेकर अब्दुल्ला-मुफ्ती सरकारों में जमायत के इस्लामीकरण एजेंडे में भरे गए थे? क्या आम हिंदू, आम भारतीय के लिए घाटी भयमुक्त बनी है? क्या घाटी का मुसलमान नियति, मजबूरी, डर कर व रियलिटी को समझ कर याकि किसी भी भाव में भारतपरस्त होता हुआ दिखता है? घाटी अलगाव और इस्लामियत का घेटो है या कश्मीरियत में लौट रहा इलाका? वहा हिंदुस्तानियत की संभावना है या तालिबानियत की?
कश्मीर घाटी का सत्य-15: एथनिक क्लींजिंगः न आंसू, न सुनवाई! क्यों?
तालिबानियत! यह शब्द मेरे कश्मीर घूमने और उस पर लिखने के एक महीने के भीतर उभरा है। अचानक ऐसी दो घटनाएं हुई हैं, जिससे वर्तमान और भविष्य दोनों के अनुमान गंभीर हैं। अफगानिस्तान में तालिबानी हुकूमत और 92 वर्षीय कश्मीरी नेता सैयद अली शाह गिलानी की मृत्यु के बाद कश्मीर घाटी की आबोहवा में, लोगों के दिलो-दिमाग में जो पका है, जो पकेगा उसे सोचते हुए लगता है कि मोदी सरकार और अमित शाह या भारत राष्ट्र-राज्य के बस में आगे की घटनाएं नहीं हैं। घाटी में भारी खालीपन है। खौफ और खुन्नस है। और निश्चित ही लोगों की मनोदशा अफगानिस्तान पर जा टिकी हैं। तभी बतौर गृह मंत्री अमित शाह को हालिया घटनाओं के बाद रोडपैम में इन चार सवालों पर विचार करना चाहिए कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद इस्लामियत में पकी मनोदशा में घाटी के लोगों को कैसे अहसास कराया जाए कि उनकी नियति भारत से बंधी हुई है? भारत में जीना-मरना है या तालिबानियों की जहालत-बर्बरता का गुलाम बनना है? दो, कैसे घाटी की मनोदशा को काबुल के तालिबानी राज की हवा, वहां के घुसपैठियों को सीमा में नहीं घुसने दिया जाए? तीन, अफगानिस्तान के राज में तालिबान की बर्बरता का घाटी के घर-घर में कैसे प्रचार हो? चार, सैयद अली शाह गिलानी की मौत के बाद घाटी की लीडरशीप में जो खालीपन बना है उसे कैसे हिंदुस्तानियत की लीडरशीप से भरा जाए?
इनमें एक भी काम आसान नहीं है। सबसे बड़ी मुश्किल घाटी की इस्लामियत में भाजपा, संघ परिवार, मोदी-शाह की स्वीकार्यता की गुंजाइश जीरो होना है। इसलिए जो एक्शन होने हैं वे एकतरफा और जोर जबरदस्ती की एप्रोच में होंगे। इस कटु हकीकत में जोर जबरदस्ती से अकेला संभव नंबर एक काम घाटी को व्यावहारिक तौर पर शेष भारत के मिजाज अनुसार हिंदू-मुस्लिम साझे में परिवर्तित करने का है। क्यों नहीं आबादी की बसावट में श्रीनगर को वैसा ही बनाने का महाप्रोजेक्ट बने जैसे जम्मू है या देश के बाकी शहर हैं? क्यों हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तानी बसावट और बुनावट लिए हुए श्रीनगर या अनंतनाग नहीं बन सकते हैं? और यदि ऐसा नहीं होता है तो घाटी का शेष भारत से घुलना-मिलना कैसे होगा? (जारी) Truth of Kashmir Valley