(“विश्व तंबाकू निषेध” दिवस पर ) धीमा जहर है तम्बाकू -डॉ रूप कुमार बनर्जी !

हमारे भारत में पहले के समय में भी हुक्का-चिल्लम, बीड़ी, खैनी आदि के द्वारा लोग नशा करते रहे हैं, किन्तु आज स्थिति कहीं बहुत ज्यादा विस्फोटक हो चुकी है। अब तो जमाना एडवांस हो गया है और एडवांस हो गए हैं नशे करने के तरीके! बीड़ी की जगह सिगरेट ने ले ली है तो हुक्का और चिल्लम की जगह स्मैक, ड्रग्स ने, और खैनी बन गया है गुटखा! वहीं शराब का तो क्या कहना। पहले शराब अमीर लोगों का शौक हुआ करता था तो अब शराब के कई सस्ते वर्जन आम लोगों की दिनचर्या का अहम हिस्सा बन गये हैं। होम्योपैथी चिकित्सक डॉ रुप कुमार बनर्जी ने विश्व तंबाकू निषेध दिवस पर बताया कि ये जानते हुए भी कि तम्बाकू एक धीमा जहर है, जो सेवन करने वाले व्यक्ति को धीरे धीरे करके मौत के मुँह में धकेलता रहता है, तब भी लोग बेपरवाह हो कर इसका इस्तेमाल किये जा रहे हैं। वैसे तो देश तमाम बीमारियों के कहर से परेशान है, लेकिन इन सब में तम्बाकू से होने वाली बीमारियां और नुकसान अपनी जड़ें और गहरी करती जा रही हैं। लोग जाने-अनजाने या शौकिया तौर पर तम्बाकू उत्पादों का सेवन करना शुरू करते हैं धीरे धीरे शौक लत में परिवर्तित हो जाता है।”‘नशा’ एक ऐसी बीमारी है जो हमें और हमारे समाज को, हमारे देश को तेजी से निगलती जा रही है, लेकिन सबसे बड़ा दुःख ये है की हमारा युवा-वर्ग इसकी चपेट में कहीं बड़े स्तर पर आ चुका है। आज शहर और गाँवों में पढ़ने खेलने की उम्र में स्कूल और कॉलेज के बच्चे, युवा वर्ग मादक पदार्थों के सेवन के आदी हो गए हैं, लेकिन इसमें सारी गलती बच्चों की ही नहीं है. गौर से देखा जाये तो कुछ हद तक इस स्थिति के जिम्मेदार हम लोग भी हैं जो इस कदर अपने कैरियर को बढ़ाने में मशगूल हैं कि हमें परवाह ही नहीं है कि हमारे बच्चे क्या कर रहे हैं, कहाँ जा रहे हैं, किससे मिल रहे हैं, ये सब जानने की हमें फुर्सत ही नहीं है! बस बच्चों की मांगें पूरी करना ही हम अपनी जिम्मेदारी समझ बैठे हैं। कभी दूसरों की देखा देखी, कभी बुरी संगत में पड़कर, कभी मित्रों के दबाव में, कई बार कम उम्र में खुद को बड़ा दिखाने की चाहत में तो कभी धुएँ के छल्ले उड़ाने की ललक, कभी फिल्मों मे अपने प्रिय अभिनेता को धूम्रपान करते हुए देखकर तो कभी पारिवारिक माहौल का असर तम्बाकू उत्पादों की लत का प्रमुख कारण बनता है।टीवी और पोस्टरों में तम्बाकू के विज्ञापन देखकर अधिकांश किशोर धूम्रपान की ओर आकर्षित हो जाते हैं। यह भी बेहद दुःख की बात है, भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के कई चर्चित अभिनेता-अभिनेत्री सिगरेट, शराब, गुटखा का खुलकर प्रचार करते हैं और सरकारी नियम इस मामले में उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाते हैं। पाया गया है कि 38 प्रतिशत किशोर, तम्बाकू के 10 अतिरिक्त विज्ञापन देखने से धूम्रपान की ओर आकर्षित होते हैं। वहीं गौर करने वाली बात ये भी है कि भारत समेत दुनिया के कई देशों में तम्बाकू विज्ञापनों पर प्रतिबंध है और संचार के किसी भी माध्यम पर तम्बाकू और उससे जुड़े उत्पादों का विज्ञापन नहीं दिखाया जा सकता है, तथा फिल्मों में भी धूम्रपान या अन्य किसी तम्बाकू उत्पाद का सेवन करते समय नीचे वैधानिक चेतावनी दिखायी जानी जरूरी है! बावजूद इसके छिपे रूप में और खुलकर भी तम्बाकू उत्पादों का प्रचार-प्रसार धड़ल्ले से चल रहा है। वहीं कई राज्यों में 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को तम्बाकू उत्पाद बेचना भी दण्डनीय अपराध है, फिर भी तम्बाकू के फैलते प्रभाव को रोकने में सरकार पूरी तरह से अगर असमर्थ नज़र आती है, तो इसके पीछे उसका नकारापन कहीं ज्यादा जिम्मेदार है। सरकार के नाक के नीचे धड़ल्ले से नशे की सामग्री बेची जा रही है! क्या सिर्फ चेतावनी भर से इस मर्ज़ का इलाज किया जा सकता है? कई तम्बाकू निर्माता चेतावनी भी कुछ इस अंदाज में लिखते हैं कि वह ‘विज्ञापन’ ज्यादा दिखता है, खतरा कम! नशे के कारोबार ने देश में अपना बहुत बड़ा बाजार खड़ा कर लिया है और बड़े-बड़े औद्योगिक घराने इसमें शामिल हैं। लेकिन आम जन मानस तक इसकी पहुँच कम तो की ही जा सकती है और अगर ठीक ढंग से इच्छाशक्ति प्रदर्शित की गयी तो इस पर पूर्ण प्रतिबन्ध भी लगाया जा सकता है, इस बात में दो राय नहीं!अगर हम बात करें, तम्बाकू उत्पादों से होने वाले नुकसान की तो, तम्बाकू में मादकता या उत्तेजना देने वाला मुख्य घटक निकोटीन (Nicotine) है, यही तत्व सबसे ज्यादा घातक भी होता है। इसके अलावा तम्बाकू मे अन्य बहुत से कैंसर उत्पन्न करने वाले तत्व पाये जाते हैं। धूम्रपान एवं तम्बाकू खाने से मुँह, गला, श्वांसनली व फेफड़ों का कैंसर (Mouth, throat and lung cancer) होता है। बीमारियां यहीं तक नहीं हैं, बल्कि दिल की बीमारियाँ, सांस फूलने की बीमारी, उच्च रक्तचाप, पेट के अल्सर , गैस, कब्जियत, एसिडिटी, अनिद्रा बाल पकना एवम् झड़ना, यौन दुर्बलता आदि रोगों की सम्भावना तम्बाकू उत्पादों के सेवन से बेहद बढ़ जाती है।गर्भवती महिलाओं के लिए तो ये और भी खतरनाक दिखता है। चाहे वो महिला स्मोकिंग करती हो या नहीं दोनों ही अवस्था उसके लिए ठीक नहीं है, क्योंकि दूसरे के द्वारा छोड़ा गया धुआं भी उसके लिए नुकसानदेह है। गर्भवती महिला जब ‘सिगरेट के धुएं’ के संपर्क में आती है, तो प्लासेंटा ठीक से काम नहीं करता है।ऐसे ही, सुन्दरता को बरकरार रखने में हमारे दांतों का बहुत बड़ा योगदान होता है, लेकिन सिगरेट में मौजूद निकोटीन दांतों को पीला कर देता है। सिगेरट से दांतों पर दाग आ जाते हैं और धीरे-धीरे दांत अपनी चमक और असली रंग को खो देते हैं। इतना ही नहीं, धूम्रपान करने वाले न करने वालों की तुलना में लगभग 1.4 साल तक अधिक बड़े दिखते हैं, तो धूम्रपान त्वचा को स्वस्थ रखने वाले ऊतकों को रक्त की आपूर्ति करने में बाधा उत्पन्न करता है, जिसके परिणामस्वरूप चेहरे पर झुर्रियां आने लगती हैं और उम्र से ज्यादा बड़े लगने लगते हैं! यह भी बेहद आश्चर्य की और मजेदार बात है कि धूम्रपान के आदी लोगों को दिल, फेफड़े, मस्तिष्क और सेक्स जीवन पर धूम्रपान के बुरे प्रभावों की काफी हद तक जानकारी है, बावजूद इसके वह अपने स्वास्थ्य हितों को ‘सिगरेट के धुएं में जला डालते हैं’। यह ‘स्मोकर्स के समग्र व्यक्तित्व को बिगाड़ सकता है।
धूम्रपान कई प्रकार की दंत समस्याओं जैसे ओरल कैंसर और अन्य कई प्रकार के मसूड़ों के रोगों का कारण बनता है। तम्बाकू और धूम्रपान का असर इतना घातक है कि नशा छोड़ने के बाद भी इसका असर खत्म नहीं होता है, इसलिए बेहतर यही होगा कि नयी पीढ़ी को इसके चंगुल में फंसने से रोका जाए।एक आंकड़े के अनुसार इस य के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है।
प्रस्तुति- विनय कुमार मिश्र