निजात की रात (शब-ए- बारात)

इस्लामी साल के आठवें महीने शाबान की पंद्रहवीं रात को शबे-बरात कहते हैं. मुसलमान इस रात में अल्लाह की इबादत करते हैं. कब्रिस्तान की जि़यारत करते हैं. और एक दूसरे से माफ़ी मांगते हैं. इसी लिए इस रात को रहमत व मग़्फ़िरत की रात कहा जाता है.
इस फ़ज़ीलत और बुज़ुर्गी वाली रात के कई नाम हैं।
1.(लैलतुल मुबारकह) बरकतों वाली रात।
2.(लैलतुल बराअह) दोज़ख़ से आज़ादी मिलने की रात।
3.(लैलतुस्सक) दस्तावेज़ वाली रात।
- (लैलतुर्रहमह) अल्लाह की ख़ास रहमत नाज़िल होने वाली रात।
शबे बरात को अल्लाह ने पांच खा़सियतें अता की हैं।
1.इस शब में हर हिक्मत वाले काम का फ़ैसला कर दिया जाता है।
2.इस रात में इबादत की बहुत ज़्यादा फ़ज़ीलत है।
3.रहमते इलाही का नुज़ूल होता है।
4.गुनाहों की बख़्शिश और माफ़ी की रात है।
5.इस रात अल्लाह ने अपने रसूल (अ. स.) को मुकम्मल शिफ़ाअत अता की। (इसकी एक अलग तफ़सील है)
हज़रत आयशा सिद्दिका़ रज़ि. अं. से रवायत है कि एक रात मैंने हुज़ूर को अलैहिस्सलाम को अपने पास ना पाया तो मैं आपकी तलाश में निकली मैंने देखा की आप जन्नतुल बक़ीय (कब्रिस्तान) में मौजूद हैं आपने मुझे देख कर कहा ऐ आयशा तुमको ये खौफ़ है कि अल्लाह और उसके रसूल तुम्हारे साथ ज़्यादती करेंगे मैंने अर्ज़ किया या रसूल-अल्लाह मुझे ये ख़्याल हुआ कि शायद आप किसी दूसरी बीवी के पास गए हैं. तो अपने फ़रमाया कि बेशक अल्लाह तआला शाबान की पन्द्रहवीं शब (रात) आसमाने दुनिया पर अपनी शान के मुताबिक़ जलवहगर होता है और क़बीलह बनू कल्ब की बक़रियों के बालों से ज्य़ादा लोगों की बख़्शिश व मग़्फ़िरत (माफ़) करता है.
(ये रवायत हदीस की अक्सर किताबों में पाई जाती है.) क़बीलह बनू कल्ब कसरत (ज़्यादा) से बक़रियां पालते थे जिनकी मिसाल (उदाहरण) इस हदीस में ब्यान की गई है. हुज़ूर अलैहिस्सलाम फरमाते हैं. अल्लाह तआला शाबान की पन्द्रहवीं शब (रात) में अपने रहम व करम से सबको माफ़ कर देता है लेकिन मुश्रिक और किना वाले को माफ़ नहीं करता दूसरी रवायत में है कि दो लोगों को माफ़ नहीं करता एक क़त्ल करने वाले को और दूसरा किना रखने वाले को.
हुज़ूर अलैहिस्सलाम फरमाते हैं जब शाबान की पन्द्रहवीं रात आती है तो अल्लाह तआला की तरफ से ऐलान होता है कि है कोई मग़्फ़िरत का तालिब (माफ़ी चाहने वाला) कि उसके गुनाह बख़्श दूँ है कोई मुझसे मांगने वाला कि मैं उसे अता करूँ इस वक़्त अल्लाह तआला से जो माँगा जाय वह मिलता है. सिवाय बदकार औरत और मुश्रिक के वह सबकी सुनता है और दुआ कु़बूल करता है।
हज़रत अली अलैहिस्सलाम से रवायत है कि हुज़ूर अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया जब शाबान की पन्द्रहवीं शब (रात) आए तो रात को क़याम (इबादत) करो और दिन को रोज़ा रखो क्यूँ कि ग़ुरूबे आफ़ताब (सूरज ढ़लने) के वक़्त से ही अल्लाह की रहमत आसमाने दुनिया पर नाज़िल हो जाती है. और अल्लाह तआला फ़रमाता है। है कोई मग़्फ़िरत तलब करने वाला कि मैं उसे बख़्श दूँ. है कोई रिज़्क़ मांगने वाला कि मैं उसे रिज़्क़ दूँ. है कोई मुसीबत ज़दह (परेशान हाल) कि मैं उसे मुसीबत से निजात दूँ. ये ऐलान तुलूऐ फ़ज्र (सूरज निकलने) तक
होता रहता है।
शबे बरात में हुज़ूर अलैहिस्सलाम ने खुद भी शब बेदारी की और दूसरों को भी हुक्म दिया. आपने फ़रमाया जब शाबान की पन्द्रहवीं रात हो तो शब बेदारी (रात में जाग कर इबादत) करो और दिन को रोज़ा रखो इस हदीस पर मुसलामानों का हमेशा से अमल रहा है कि रात में जागकर अल्लाह की इबादत (क़ुरआन की तिलावत, नवाफ़िल नमाज़, तसबीह ज़िक्र, दुआ और असतग़्फ़ार वग़ैरह) करते हैं।
शैख़ अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी फ़रमाते हैं कि ताबेईन में जलीलुल क़द्र हज़रात मस्जिद में जमा हो कर शाबान की पंद्रहवीं रात में शब बेदारी करते थे और रात भर मस्जिद में इबादत करते थे।
हदीस में हुज़ूर अलैहिस्सलाम का इस रात में क़ब्रिस्तान जाना साबित है इसलिए मुसलमान भी इस रात को क़ब्रिस्तान जाते हैं और अपने मरहूमीन (मुर्दों) को फ़ातिहा पढ़कर ईसाले सवाब करते हैं।
हुज़ूर अलैहिस्सलाम रमज़ान के बाद माहे शाबान में रोज़ों का ज़्यादा एहतिमाम करते थे। हज़रत उसामा बिन ज़ैद ने आपसे अर्ज़ किया कि मैंने आपको रमज़ान के अलावा शाबान में इतने रोज़े रखते नहीं देखा, हुज़ूर ने फ़रमाया ये महीना ऐसा है कि लोगों के आमाल अल्लाह के सामने पेश किए जाते हैं, इसलिए मैं यही पसंद करता हूँ कि रोज़े के साथ मेरे आमाल अल्लाह के दरबार में पेश किये जाएं।
बिला शुबहा, शबे बरात दुनिया व आखि़रत को संवारने वाली रात है। अल्लाह और उसके रसूल अलैहिस्सलाम की क़ुर्बत हासिल करने का ज़रिया है। हुब्बे इलाही और मोहब्बते रसूल की तरफ़ एक दावत है। शबे बरात हमारे लिए एक अल्टीमेटम है कि इस रात अल्लाह की याद में अश्क बार हो कर गुनाहों के बोझ से छुटकारा पाएं। और सुकूने क़ल्ब हासिल करें।
अल्लाह से दुआ है कि इस शबे बरात के सदक़े व तुफ़ैल हम सबके गुनाहों को माफ़ करे। हमें नेक बनाये, और एक दूसरे के हुक़ूक़ को अदा करने की तौफ़ीक़ दे। हमारे मुल्क हिन्दुस्तान में अम्नो अमान अता करे। कोरोना वाइरस जैसी ख़तरनाक बीमारी व महामारी की वज़ह से अपने घर पर ही इबादत करें और पूरी इन्सानियत की हिफ़ाज़त फ़रमाए। (आमीन)
लेखक:- सैय्यद हसनैन मुहम्मदी
(सफ़ी इब्ने सफ़ी)
रिसर्च स्काॅलर- इलाहाबाद विश्वविद्यालय
सज्जादा नशीन- खा़नक़ाह सुहरवर्दिया, चिश्तिया
इलाहाबाद।
मुक़ीम हाल – अनसार टोला, ख़लीलाबाद,
संतकबीरनगर