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मोज़ा बैराड़ी मुसतहकम की चाँद मस्जिद में 17 रमज़ान की रात और 18वीं तरावीह में कुरआन शरीफ़ मुकम्मल हुआ। इस मौके पर लखनऊ से आए मुफ़्ती उमर फारूक क़ासमी बुलंदशहरी ने इंसानियत, आपसी भाईचारे और शिक्षा की अहमियत पर महत्वपूर्ण बातें कहीं। बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे और देश-दुनिया में अमन-शांति के लिए दुआ की गई।
विस्तृत समाचार:
मोज़ा बैराड़ी मुसतहकम स्थित चाँद मस्जिद में रमज़ान के मुकद्दस महीने की 17वीं रमज़ान की रात और 18वीं तरावीह में कुरआन शरीफ़ मुकम्मल होने पर एक रूहानी और खुशी का माहौल देखने को मिला। इस मौके पर बड़ी संख्या में नमाज़ी मौजूद रहे।
इस साल चाँद मस्जिद में तरावीह की नमाज़ में कुरआन शरीफ़ सुनाने की जिम्मेदारी लखनऊ से तशरीफ लाए आलिम-ए-दीन मुफ़्ती उमर फारूक क़ासमी बुलंदशहरी ने निभाई। उन्होंने पूरे रमज़ान में तरावीह में कुरआन शरीफ़ सुनाया और मुकम्मल होने के बाद कुरआन शरीफ़ के विषय पर लोगों के सामने एक अच्छा और असरदार बयान भी किया।
अपने बयान में उन्होंने कहा कि कुरआन शरीफ़ सिर्फ मुसलमानों के लिए ही नहीं बल्कि पूरी इंसानियत के लिए राह दिखाने वाली किताब है। यह इंसान को सच्चाई, न्याय, भलाई, इंसानियत की सेवा और आपसी भाईचारे की शिक्षा देता है। उन्होंने कहा कि कुरआन को केवल पढ़ना ही काफी नहीं है बल्कि उसे समझकर अपनी जिंदगी में अपनाना भी बहुत जरूरी है।
मुफ़्ती साहब ने समाज में शिक्षा की अहमियत बताते हुए कहा कि आज का दौर पढ़ाई और ज्ञान का दौर है। बिना शिक्षा के किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ना बहुत मुश्किल हो जाता है। उन्होंने बताया कि इस्लाम की पहली वह्यी “इक़रा बिस्मि रब्बिकल्लज़ी ख़लक” से शुरू होती है, जिसका मतलब है कि इंसान को पढ़ना चाहिए और ज्ञान हासिल करना चाहिए। इसलिए हर माता-पिता की जिम्मेदारी है कि वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा जरूर दिलाएं।
उन्होंने बच्चों की अच्छी परवरिश और अच्छे संस्कार देने पर भी जोर दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि लड़कों के साथ-साथ लड़कियों की पढ़ाई भी बहुत जरूरी है। उन्हें दुनियावी शिक्षा के साथ दीन और अच्छे संस्कारों की शिक्षा भी दी जानी चाहिए ताकि वे किसी भी माहौल में अपनी इज्जत, अपने परिवार की इज्जत और अपने धर्म व संस्कारों की रक्षा करने वाली बन सकें।
इस मौके पर देश में अमन-शांति, आपसी भाईचारे, समाज की भलाई और पूरी दुनिया में शांति के लिए खास दुआ कराई गई। साथ ही यह भी दुआ की गई कि अल्लाह तआला सभी लोगों को रमज़ान के महीने को सही तरीके से बिताने की तौफीक अता फरमाए।
कार्यक्रम के दौरान स्थानीय नौजवान कमेटी और जिम्मेदार लोगों की ओर से नमाज़ियों के लिए मिठाई और पानी आदि का इंतज़ाम भी किया गया। इस व्यवस्था में मुख्य रूप से वाजिद भाई, अब्दुर्रहीम भाई (डड़वा निवासी), मौलाना तल्हा साहब (सदर मुदर्रिस), शमीम उर्फ गुड्डू भाई,) आज़म भाई, नज़्म भाई सहित कई लोगों ने अहम भूमिका निभाई।
कुछ जिम्मेदार साथी किसी कारण से उस समय मौजूद नहीं हो सके, लेकिन फोन के जरिए कार्यक्रम से जुड़े रहे, जिनमें खास तौर पर हाजी शम्सुद्दीन साहब और कारी मोहम्मद हस्सान साहब (वर्तमान में मुंबई में) हैं।
कार्यक्रम में मस्जिद के इमाम हाफिज़ मोहम्मद नौशाद साहब ने लोगों को ईशा की नमाज़ अदा कराई। कुरआन शरीफ़ मुकम्मल होने के बाद डॉ. हादी अलवरा ने अपने घर पर मुफ़्ती उमर फारूक क़ासमी साहब और अन्य उलेमा-ए-कराम की मेहमाननवाज़ी करते हुए भोजन का इंतज़ाम भी किया।
कार्यक्रम में सैकड़ों की संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया और कुरआन शरीफ़ मुकम्मल होने की खुशी में दुआ में शामिल हुए।