दुनिया के उन देशों ने भी जलवायु की दीर्घकालिक चिंता छोड़ दी है, जिन्हें जलवायु परिवर्तन के मसले पर संवेदनशील समझा जाता था। यूरोप को इस मामले में दुनिया में अग्रणी समझा जाता था। लेकिन वहां अब ट्रेंड पलटने के संकेत हैँ। विभिन्न देश कोयला से बिजली बनाने की तरफ लौटने लगे हैं।
दुनिया को ऊर्जा संकट का मुकाबला करना पड़ रहा है। इससे उबरना बेशक एक प्राथमिकता है। लेकिन अगर इस प्राथमिकता की बलि मानवता का भविष्य चढ़ने लगे, तो वह बेहद अपशकुन संदेश होगा। लेकिन होता ऐसी ही दिख रहा है। ऐसा लगता है कि दुनिया के उन देशों ने भी जलवायु की दीर्घकालिक चिंता छोड़ दी है, जिन्हें जलवायु परिवर्तन के मसले पर संवेदनशील समझा जाता था। यूरोप को इस मामले में दुनिया में अग्रणी समझा जाता था। लेकिन वहां अब ट्रेंड पलटने के संकेत हैँ। ब्रिटेन से लेकर जर्मनी तक कोयला से बिजली बनाने की तरफ लौटने लगे हैं। कारण सिर्फ यह है कि इस समय कोयले से बिजली बनाना प्राकृतिक गैस की तुलना में सत्ता पड़ रहा है। कुछ देशों ने कच्चे तेल के नए स्रोतों की खोज भी तेज कर दी है। उधर चीन ने भी अब अधिक संख्या में कोयला से चलने वाले बिजली संयंत्र बनाने का फैसला किया है। चीन सरकार ने कहा है कि बिजली की नियमित सप्लाई रखना फिलहाल उसकी पहली प्राथमिकता है। जबकि चीन ने इसके पहले ये एलान किया था कि उसके यहां कार्बन उत्सर्जन 2030 तक चरम बिंदु पर पहुंच जाएगा। उसके बाद इसमें गिरावट शुरू होगी। इस कार्यक्रम के मुताबिक 2060 तक चीन अपने कार्बन उत्सर्जन को शून्य कर देगा।
लेकिन विभिन्न देशों में जलवायु परिवर्तन रोकने के उपायों के प्रति कमजोर पड़ती इस निष्ठा की दुनिया को महंगी कीमत चुकानी पड़ सकती है। ये बात अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने भी कही है। उसने अपने ताजा वर्ल्ड एनर्जी आउटलुक में आगाह किया है कि 2050 तक उत्सर्जन घटाने के जो लक्ष्य रखा गया है, उसमें 60 फीसदी की कमी रह जाएगी। लक्ष्य 2050 तक कार्बन उत्सर्जन शून्य करने का लक्ष्य है। आईईए ने अपनी रिपोर्ट अगले महीने स्कॉटलैंड के ग्लासगो में होने वाले संयुक्त राष्ट्र के जलवायु सम्मेलन कॉप-26 से ठीक पहले जारी की है। आईईए ने कहा है कि लक्ष्य और हकीकत के बीच फर्क बहुत चौड़ा हो चुका है। ये खाई तभी भर सकती है, जब दुनिया भर के देश ग्रीन एनर्जी को अपनाने के लिए चार ट्रिलियन डॉलर अगले एक दशक में खर्च करेँ। लेकिन इस समय देशों का रूझान अपनी फौरी ऊर्जा सुरक्षा पर है। ऐसे में आईईए की बात सुनी जाएगी, इसकी संभावना कम है। ऐसे में ग्लोबल वॉर्मिंग का क्या होगा, आसानी से समझा जा सकता है।