हालिया सूरत यह है कि दुनिया में लोकतंत्र और मानव अधिकारों की जो प्रचलित धारणा और कसौटियां हैं, उन पर भारत के रिकॉर्ड की आलोचना बढ़ती गई है। अमेरिका का फ्रीडम हाउस हो या स्वीडन स्थित वी-डेम इंस्टीट्यूट- उनके सबके लोकतंत्र सूचकांकों पर भारत का दर्जा गिरा है।
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की सालगिरह पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आयोग के अध्यक्ष जस्टिस अरुण मिश्रा ने जो भाषण दिए, सामान्य स्थितियों में कहा जाता कि उससे मानव अधिकारों की अवधारणा पर एक बहस खड़ी हुई है। लेकिन आज के संदर्भ में अनेक यह मानेंगे कि इसके जरिए मानव अधिकारों की विश्व प्रचलित अवधारणा को सीधी चुनौती दी गई है। उन भाषणों लब्बोलुआब यह है कि मानव अधिकारों का इस्तेमाल भारत को बदनाम करने के लिए किया जा रहा है। वैसे अगर पूरे संदर्भ पर गौर करें, तो ऐसी बातें पहली बार सुनने को नहीं मिली हैं। बल्कि कुछ ही दिन पहले गृह मंत्री अमित शाह ने इस समझ को चुनौती दी थी कि भारत में लोकतंत्र का आगमन वर्तमान संविधान लागू होने के बाद हुआ। उन्होंने कहा कि भारत में इसकी प्राचीन परंपरा है और असल में लोकतंत्र का जन्मदाता ही भारत है। शाह ने जानबूझ कर गणतंत्र और लोकतंत्र को एक बताया या वे इसको लेकर खुद भ्रम में हैं, यह जानने का हमारे पास कोई माध्यम नहीं है।
बहरहाल, हालिया सूरत यह है कि दुनिया में लोकतंत्र और मानव अधिकारों की जो प्रचलित धारणा और कसौटियां हैं, उन पर भारत के रिकॉर्ड की आलोचना बढ़ती गई है। अमेरिका का फ्रीडम हाउस हो या स्वीडन स्थित वी-डेम इंस्टीट्यूट- उनके सबके लोकतंत्र सूचकांकों पर भारत का दर्जा गिरा है। यही हाल प्रेस फ्रीडम की कसौटियों पर भी है। इससे एक आम छवि यह बनी है कि भारत धार्मिक बहुसंख्यकों के वर्चस्व वाला निर्वाचित एकाधिकारवादी देश बनता जा रहा है। ऐसे देशों में मानव अधिकारों का मतलब एक खास समुदाय और उसमें भी अभिजात्य वर्ग के अधिकारों तक सिमट जाता है। भारत सरकार इस छवि को पसंद नहीं करती। कुछ समय पहले ये खबर आई थी कि उसने डेमोक्रेसी इंडेक्स बनाने वाली संस्थाओं से संपर्क किया है और ये कहा है कि अपनी रिपोर्टों में भारत सरकार की लोकतंत्र के बारे में क्या समझ है, उसे भी शामिल करेँ। लेकिन ये पेशकश नहीं मानी गई। तो क्या उसके बाद भारत सरकार ने यह सोच लिया है कि दुनिया जो समझे, सो समझे- वह लोकतंत्र और मानव अधिकारों की अपनी परिकल्पना प्रचारित करेगी और उस पर ही चलेगी? बेशक ऐसा करने से उसे कोई नहीं रोकेगा। लेकिन उसकी परिकल्पना दुनिया स्वीकार लेगी, इसकी भी कोई संभावना नहीं है। असलियत यह है कि भारत में भी उसकी परिकल्पना को उसके समर्थक वर्गों के बीच ही स्वीकार किया जाएगा।