संतकबीरनगर

उम्मे कुल्सूम ने छ: साल छ: महीने की उम्र में पहला रोजा मुकम्मल किया भूख प्यास लगी, लेकिन सवाब मिलने की तमन्ना सब पर भारी रही। रमज़ान की तय्यारी ज़ोरो शोर से हो रही थी। रोज़ा रखने से हमें गरीब व् असहाय लोगों की पीड़ा का एहसास होता है। और उन की सहायता करने और भूखों को खाना खिलाने की सीख मिलती है। तो हम ने भी रोज़ा रखने का मन बना लिया। सेहरी के समय का इन्तेज़ार करते रहे। और सेहरी खाकर रोज़ा रखने की नीयत कर लिये। दिन भर इबादत कर के बहुत सुकून मिला। और फिर इफ्तार के समय ऐसी लज़्ज़त प्राप्त हुई जो शब्दों में बयान नहीं की जा सकती। सब के चेहरों पर मुस्कान थी, और सब लोग हमें शाबाश कह रहे थे। यह सब देख कर हमें बहुत ख़ुशी मिली। बच्ची के इस जज़्बे की सभी तारीफ कर रहे हैं। और दुनिया से कोरोना के खातमें की दुवायें भी मांगी अल्लाह न्नहे रोजेदार की दुवायें कुबूल फरमाये आमीन ।