गंभीर एनीमिया से ग्रसित गर्भवती महिलाओं के लिए वरदान बना आयरन शुक्रोज
– चिकित्सकों की सलाह पर दी जाती है आयरन शुक्रोज की खुराक
– जिले की चार एफआरयू पर लगाया जाता है आयरन शुक्रोज
संतकबीरनगर, 13 फरवरी 2020
जितेन्द्र चौधरी


हैंसर की रहने वाली 7 माह की गर्भवती 25 वर्षीया सबीना खातून जब सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र हैसर जांच कराने के लिए गई तो 9 जनवरी को उनका हीमोग्लोबीन स्तर 6.8 था। चिकित्सक ने उनको आयरन शुक्रोज लगवाने की सलाह दी। 51 किलोग्राम की सबीना के लिए आयरन शुक्रोज की 7 डोज निर्धारित की गई। वह जब 5 फरवरी को आयरन शुक्रोज की अन्तिम डोज लगवाईं तो उनका हीमोग्लोबीन स्तर 10.8 तक पहुंच गया। अब वे एनीमिया से मुक्त होकर एक स्वस्थ व विकसित बच्चे को जन्म देने को तैयार हैं।
एसीएमओ आरसीएच ( प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य ) डॉ मोहन झा बताते हैं कि गर्भावस्था के दौरान एनीमिया की शिकार महिलाओं के लिए आयरन शुक्रोज वरदान है। इससे शिशु और मातृ मृत्यु दर को रोकने के साथ ही बच्चों के मस्तिष्क के विकास की कमी जैसी गंभीर बीमारियों में भी कमी आई है। चिकित्सकों की निगरानी में गर्भवती को लगाए जाने वाला आयरन शुक्रोज जिले की सभी एफआरयू पर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। जब किसी गर्भवती महिला के हीमोग्लोबीन का स्तर 7 से कम हो तो उसे आयरन शुक्रोज लगाया जाता है, या फिर विषम परिस्थितियों में हीमोग्लोबीन स्तर 8.9 से कम हो तो भी लगाया जा सकता है। लेकिन इसका निर्धारण कुशल चिकित्सको के द्वारा किया जाता है। मरीज के वजन व वर्तमान हीमोग्लोबीन की मात्रा से आयरन शुक्रोज के कुल खुराक की गणना की जाती है। इसके बाद एक दिन के अन्तर पर मरीज को इंजेक्शन लगवाने के लिए अस्पताल पर आना पड़ता है। जिले के सभी चार एफआरयू जिला अस्पताल, सीएचसी खलीलाबाद, सीएचसी हैसर व सीएचसी मेंहदावल में यह सुविधा मौजूद है।
इसलिए जरुरी है हीमोग्लोबीन मेण्टीनेन्स
स्त्री व प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ विजय गुप्ता बताते हैं कि गर्भवती महिलाओं में हीमोग्लोबीन की जरुरत इसलिए होती है कि प्रसव के दौरान अगर महिला को अधिक ब्लीडिंग हो जाएगी तो रक्त अल्पता से ग्रसित महिलाओं में मृत्यु का खतरा अधिक होता है। इसलिए यह जरुरी है कि उनके अन्दर हीमोग्लोबीन को मेण्टेन किया जाय, ताकि ब्लीडि़ंग के बाद भी उसके हीमोग्लोबीन का स्तर न सामान्य बना रहे।
विशेषज्ञ चिकित्सकों निगरानी में लगता है शुक्रोज
यह आयरन शुक्रोज विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में लगाया जाता है। वह चिकित्सक महिला की लम्बाई, हीमोग्लोबीन की वर्तमान मात्रा और वजन के हिसाब से उसके डोज का आकलन करते हैं।
मुहर से होती है डोज की निगरानी
महिला के एनीमिया ग्रसित होने की जानकारी होने के बाद उसके पर्चे पर एक मुहर लगा दी जाती है। इसी मुहर में कमल की 8 पंखुडि़यों जरिए अधिकतम डोज का निर्धारण होता है। जितने डोज दिए जाते हैं उतनी पंखुडियों के साथ सामने डोज देने की तारीख लिख दी जाती है।
जिले में 50.4 प्रतिशत महिलाओं में खून की कमी
जिला सर्विलांस अधिकारी डॉ ए के सिन्हा बताते हैं कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे- 4 के अनुसार संतकबीरनगर जनपद में 6 से 59 माह के लगभग 69.1 प्रतिशत बच्चे खून की कमी से जूझ रहे हैं। 15 से 49 वर्ष की कुल लगभग 50.4 प्रतिशत महिलाएं खून की कमी से ग्रसित हैं । इनमें 15-49 वर्ष की लगभग 50.1 फीसद गर्भवती महिलाएं हैं, जबकि 50.9 प्रतिशत साधारण महिलाएं हैं। हालांकि मातृ एवं शिशुओं के लिए चलायी जा रही तमाम योजनाओं से इन आंकड़ों में निरंतर कमी आ रही है |