

संतकबीरनगर, उत्तर प्रदेश।
हीरालाल रामनिवास स्नातकोत्तर महाविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग द्वारा “स्वतंत्रता आंदोलन का मील पत्थर -: काकोरी क्रांति योजना” विषय पर व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम का संचालन राजनीति विज्ञान के अध्यक्ष शशिकांत राव ने किया । कार्यक्रम महान क्रांतिकारी योद्धा राजेंद्र लाहिड़ी जी के बलिदान दिवस पर विनम्र श्रद्धांजलि के बाद शुरू हुआ। उन्होंने बताया कि काकोरी योजना के बाद क्रांतिकारी युवाओं में एक नये उर्जा का संचार हुआ जो आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में मील का पत्थर साबित हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर विजय कृष्ण ओझा जी ने क्रांतिकारियों के बारे में बताया कि वे फांसी के समय मुस्कुरा रहे थे और कह रहे थे कि इस आजादी के लिए चाहे जितनी बार जन्म लेना पड़े उसके लिए हम तैयार हैं इस देश की आजादी हमारे लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है । मुख्य वक्ता डॉ मनोज कुमार मिश्र बताया कि असहयोग आंदोलन के स्थगित होने पर भारतीय युवाओं का रुझान क्रांतिकारी आंदोलनों की ओर हो गया जिसके परिणाम स्वरूप पूरे देश में क्रांतिकारी संगठनों ने गुप्त ढंग से कार्य करना आरंभ किया । इन्हीं संस्थाओं में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन था । इस समिति में रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, अशफाक उल्ला खान, रोशन सिंह , रामकृष्ण खत्री जैसे कई क्रांतिकारी सम्मिलित हुए। हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन के सदस्य सशस्त्र संघर्ष के द्वारा अंग्रेजों से स्वतंत्रता चाहते थे । इन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन एकत्रित करने के लिए तथा अंग्रेजों की सत्ता को चुनौती देने के लिए सहारनपुर से लखनऊ के बीच चलने वाली पैसेंजर ट्रेन से जाने वाले सरकारी खजाने को हस्तगत करने के लिए काकोरी क्रांति योजना बनाई । इसे 9 अगस्त 1925 को कार्य रूप दिया गया। इस योजना के मुख्य सूत्रधार पंडित राम प्रसाद बिस्मिल थे। इनके साथ राजेंद्र नाथ, लाहिड़ी, रोशन सिंह, अशफाक उल्ला खान, रामकृष्ण खत्री चंद्रशेखर आजाद मन्मथ नाथ गुप्त आदि सम्मिलित थे । डॉ मनोज ने बताया कि स्वतंत्र भारत में इतिहासकारों ने काकोरी क्रांति योजना को काकोरी कांड के रूप में लिपिबद्ध किया है जबकि यह क्रांतिकारी गतिविधियों का एक हिस्सा था जिसका उद्देश्य सशस्त्र संघर्ष के लिए धन जुटाना था । इसलिए इसे काकोरी क्रांति के रूप में याद रखना ज्यादा उचित होगा । इस क्रांति को ब्रिटिश सरकार ने बहुत गंभीरता से लिया ।इस क्रांति को कुल 10 लोगों ने कार्य रूप दिया था जबकि इसके लिए कुल 40 लोगों को गिरफ्तार किया गया जिसमें राम प्रसाद बिस्मिल, रोशन सिंह ,राजेंद्र लाहिड़ी, अशफाक उल्ला खान को फांसी की सजा दी गई ।राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर , राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को गोंडा जेल, अशफाक उल्ला खां को फैजाबाद जेल, रोशन सिंह को मलूका जेल इलाहाबाद में फांसी की सजा दी गई । इस क्रांति से जुड़े लोगों की फांसी मिलने के बाद क्रांतिकारी गतिविधियों में वृद्धि हुई । इसके बाद स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर करने युवाओं के लिए इस क्रांति के नेता आदर्श बन गए। मनोज मिश्रा ने युवाओं से आह्वान किया कि हमें इस क्रांति तथा इससे जुड़े महापुरुषों के जीवन का अध्ययन करना चाहिए तथा वर्तमान भारत को सशक्त बनाने के लिए इन से प्रेरणा लेनी चाहिए।
कार्यक्रम का आयोजन एवं संचालन डॉ शशिकांत राव ने किया।
इस अवसर पर राजनीति विज्ञान विभाग के आचार्य डॉ हेमेंद्र शंकर, डा. विजय मिश्रा, डा. कन्हैया आदि मौजूद रहे।