कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी छद्म नैतिकता की प्रेतबाधा के शिकार हो गए हैं। उनको लग रहा है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के बुरी तरह से हारने के बाद जब उन्होंने हार की जिम्मेदारी लेते हुए कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था तो अब दो साल में क्या बदल गया है, जो उनको फिर से अध्यक्ष बन जाना चाहिए! यह एक नैतिक दुविधा है, राजनीति में जिसका शिकार सिर्फ वैसे लोग हो सकते हैं, जिनमें थोड़ी-बहुत शर्म बची होती है। सो, कह सकते हैं कि राहुल में थोड़ी बहुत शर्म बची हुई है और इसलिए वे अभी कांग्रेस अध्यक्ष बनने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं। वे पिछले दो साल से इस बात की कोशिश और इंतजार करते दिख रहे हैं कि कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति में कुछ सुधार हो, जिसका श्रेय उनको मिले और तब वे फिर कांग्रेस अध्यक्ष बनें। उनकी यह दुविधा और उनका इंतजार कांग्रेस में पिछले दो साल से बने गतिरोध और कई नई समस्याओं के लिए जिम्मेदार है। Rahul gandhi congress President
उन्होंने नैतिकता का यह चोला तो ओढ़ा हुआ है कि वे कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनेंगे लेकिन असल में कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में काम करते रहेंगे। यह असलियत सबको पता है कि राहुल गांधी ही वास्तविक कांग्रेस अध्यक्ष हैं। कपिल सिब्बल ने इसी ओर इशारा करते हुए कहा था कि कांग्रेस में कोई चुना हुआ अध्यक्ष नहीं है फिर भी कौन फैसले कर रहा है! जाहिर है फैसले सारे राहुल गांधी कर रहे हैं। पंजाब में मुख्यमंत्री बदलने का फैसला हो या अध्यक्ष की नियुक्ति का फैसला हो, दोनों राहुल गांधी के सरकारी आवास पर हुए। छत्तीसगढ़ में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर जो पूरा घटनाक्रम चला उसका भी केंद्र राहुल गांधी का आवास था। संगठन से लेकर चुनाव और यहां तक कि पार्टी के रोजमर्रा के कामकाज के सारे फैसले भी राहुल गांधी और उनकी टीम के लोग कर रहे हैं। फिर ऐसी नैतिकता किस काम की! यह तो गुड़ खाकर गुलगुले से परहेज करने जैसा है!
Read also क्या नरेंद्र मोदी तानाशाह हैं?
राहुल गांधी बिना जिम्मेदारी के अध्यक्ष पद के सारे अधिकारों का इस्तेमाल कर रहे हैं, यह सीधे अध्यक्ष बन जाने से ज्यादा बुरा है। ऐसा भी नहीं है कि ये सब काम ढके-छिपे हो रहे हैं। सब कुछ लोगों की आंखों के सामने हो रहा है। फिर भी अगर राहुल और उनकी टीम यह समझ रही है कि वे अध्यक्ष पद पर नहीं हैं इसलिए कोई जिम्मेदारी उनके ऊपर आयद नहीं होती है या किसी चीज का दोष उनके सर नहीं जाएगा तो वे गलतफहमी में हैं। वे अध्यक्ष रहें या न रहें, कांग्रेस कहीं भी हारेगी या खराब प्रदर्शन करेगी तो उसका ठीकरा उनके सर फूटेगा और कांग्रेस कुछ भी अच्छा करेगी तो उसका श्रेय उनको मिलेगा। सोचें, जब सारे अधिकार उनके पास है, सारे फैसले उनको करने हैं, हार की जिम्मेदारी उनको लेनी है और जीत का सेहरा उनके सर बंधना हैं तो फिर अध्यक्ष पद संभालने में क्या बाधा है? असल में उनके रास्ते में कोई बाधा नहीं है। पूरी पार्टी पलक पावड़े बिछाए उनके आने का इंतजार कर रही है। फिर भी वे अध्यक्ष नहीं बन रहे हैं या इसे टाल रहे हैं तो यह छद्म नैतिकता की प्रेतबाधा के चलते है।
Rahul gandhi congress President
वे अपने को सत्ता और अधिकार से निरपेक्ष दिखाने का प्रयास कर रहे हैं। उच्च नैतिक मानदंड स्थापित करना चाहते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बन कर वे यह दिखाना चाहते हैं कि वे सत्ता और अधिकार की राजनीति से निर्लिप्त हैं। वे यह भी दिखाना चाहते हैं कि अध्यक्ष बने बगैर वे जो रैलियां करते हैं, भाषण देते हैं, ट्विट आदि करके सरकार पर हमला करते हैं वह देश के लिए है, कांग्रेस के लिए नहीं। यानी सरकार के खिलाफ उन्होंने जो मोर्चा खोला है वह देश की खातिर है, देश को बचाने की खातिर है। कांग्रेस की मजबूती के लिए काम करना भी देश को बचाने के लिए ही है, जैसा कि हाल ही में उनकी पार्टी में शामिल हुए कम्युनिस्ट नेता कन्हैया कुमार ने कहा। यह अगर रणनीति के स्तर पर हो तो यह भी कोई बुरी रणनीति नहीं है। लेकिन उसके लिए राहुल को कांग्रेस के रोजमर्रा के कामकाज से अलग होकर एक नैतिक सत्ता बनाने की जरूरत है, जैसी महात्मा गांधी ने बनाई थी और बाद में जयप्रकाश नारायण ने बनाई। महात्मा गांधी ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था और खुद को कांग्रेस के रोजमर्रा के कामकाज से अलग कर लिया था। लेकिन कांग्रेस में जब भी कोई संकट होता था या संगठन के बारे में फैसला करना होता था तो सारे नेता उनके दरवाजे पर जाते थे। राहुल कुछ कुछ वैसी ही व्यवस्था बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इसके लिए अपने को पूरी तरह से सक्रिय राजनीति से अलग करना होगा तभी उनकी नैतिक सत्ता बनेगी।
Rahul gandhi congress President
Read also एयर इंडिया का बिकना जश्न की बात नहीं है
सो, या तो वे पूरी तरह से डूब कर राजनीति करें या सक्रिय राजनीति से इतर अपनी एक नैतिक सत्ता बनाएं, जिसके आगे सारे कांग्रेसी नेता सर झुकाएं। दोनों एक साथ संभव नहीं है। अगर ये दोनों चीजें वे एक साथ करते हैं तो पार्टी में हमेशा वह संकट बना रहेगा, जो अभी है। उनके इस दोहरे व्यक्तित्व की वजह से ही कांग्रेस के जी-23 और जी हुजूर-23 के नेताओं का संघर्ष खत्म नहीं हो रहा है। अगर वे अध्यक्ष नहीं रहते हुए अध्यक्ष की तरह काम नहीं कर रहे होते तो कपिल सिब्बल को यह कहने का मौका नहीं मिलता कि पता नहीं कौन फैसले कर रहा है! अगर वे अध्यक्ष बन कर इस तरह के फैसले करते तब भी सिब्बल को ऐसा कहने का मौका नहीं मिलता। जाहिर तौर पर कांग्रेस का संकट राहुल गांधी की छद्म नैतिक प्रेतबाधा की वजह से है। वे अगर कांग्रेस अध्यक्ष रहते तो उन पर सिर्फ विफलता के आरोप लगते, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष नहीं रहते हुए अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे हैं तो विफलता के साथ साथ दोहरे आचरण के आरोप भी झेल रहे हैं। राहुल और उनकी टीम को यह समझना चाहिए वे जिस व्यवस्था के तहत कांग्रेस को चला रहे हैं, उसका विफल होना अवश्यंभावी है। वे अध्यक्ष पद संभाल कर राजनीति करेंगे तब भी विफल होने की संभावना रहेगी लेकिन उसमें सफलता की गुंजाइश भी बराबर रहेगी।