वतन की मुहब्बत का बेमिसाल जज़्बा रखते थे अब्दुल क़य्यूम अंसारी- मुफ्ती सलीम नूरी
16 साल की छोटी सी उम्र में आज़ादी ए हिन्द के लिये जेल गये थे अब्दुल क़य्यूम अंसारी।
तहरीके आज़ादी के नामवर सितारे थे अब्दुल क़य्यूम अंसारी: मुफ़्ती मुहम्मद सलीम
बरेली, उत्तर प्रदेश

तहरीके जंगे आज़ादी और मुल्क को ज़ालिम अंग्रेज़ी हुकूमत के पंजों से निकालने में हिन्दुस्तान के मुस्लिम रहनुमाओं, अवाम व ख़्वास, उलमा, मदरसे के तलबा, मस्जिदों के इमाम और मुफ़्तीयान किराम ने बढ चढ़ कर हिस्सा लिया था।लाखों उलमा, समाजी व सियासी रहनुमाओं और आम लोगों को फांसी पर चढ़ाया गया। विभिन्न जेलों में क़ैद व बंद की कठिनाईयाँ यहाँ तक कि काला पानी की सज़ायें भी दी गई । मुसलमानों को अंग्रेज़ों के खि़लाफ़ आवाज़ बुलंद करने के कारण अपनी ज़मीन व जायदाद की ज़ब्ती व नीलामी और तबाही व बर्बादी का भी सामना करना पड़ा। आलाहज़रत के मदरसा मंज़रे इस्लाम के वरिष्ठ शिक्षक मुफ़्ती मोहम्मद सलीम बरेलवी साहब ने मंजरे इस्लाम की ई-पाठशाला द्वाराआयोजित एक कार्यक्रम मे यह विचार व्यक्त किए ।
दरगाह के मीडिया पभारी नासिर कुरैशी ने बताया कि दरगाह प्रमुख हज़रत सुब्हानी मियां साहब और सज्जादानशीन हज़रत अहसन मिया साहब की देखरेख मे चलने वाले मदरसा मंजरे इस्लाम मे जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी जनाब जगमोहन सिंह जी के तत्वाधान मे सम्पन्न हुए इस कार्यक्रम के माध्यम से मुस्लिम समुदाय के छात्रो, युवा पीढ़ी को आज मुफ्ती सलीम नूरी साहब ने बताया कि आज ही के दिन दिनांक 1 जुलाई 1905 मे जंगे आज़ादी के इन्हीं योद्धाओ में एक अहम योद्धा अब्दुल क़य्यूम अंसारी साहब का जन्म हुआ था जिन्होंने अंग्रेज़ों के खिलाफ़ एक मज़बूत आवाज़ बुलंद की, अंग्रेज़ी हुकूमत की ईट से ईट बजाने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर चलने वाली तहरीके जंगे आज़ादी में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने की वजह से कई बार जेल जाना पड़ा। अब्दुल क़य्यूम अंसारी 01 जुलाई 1905 ई0 सूबा बिहार के रोहतास ज़िले के ढेहरी आनसोन में पैदा हुये। इनके पिता का नाम मौलाना अब्दुल हक़ था इन्होंने बेसिक शिक्षा सहसराम और ढेरही आनसोन के हाई स्कूल में हासिल की। वह अअसहयोग आंदोलन व नान को-आपरेशन मूवमेंट के 14 साल की उम्र में हिस्सा बन गये। वह भारत विभाजन के धोर विरोधी थे। इन्होंने मुस्लिम पसमांदा समाज की तरक़्की के लिये ज़िंदगी भर प्रयास किए । गाँधी जी इनसे बहुत मुहब्बत रखते थे और यह गाँधी जी के बहुत क़रीब थे। अंसारी साहब के पूर्वज हज़रत शैख शाह आलम, हिमायूँ की हुकूमत में चकलादार के पद पर ब्राजमान थे। आखिरी उम्र में वह रिटायर होकर अपने वतन अकबरपुर और बाद में अपनी आबाद कर्दा बस्ती नोली ज़िला ग़ाज़ीपुर यू0 पी0 में रहने लगे। इंक़लाब 1857 ई0 तक इस ख़ानदान का पेशा किसानी व कारोबार रहा।1876 ई0 में सोन नदी के किनारे स्थित ढहरी आनसोन, सहसराम ज़िला शाहबाद अब रोहतास बिहार आकर आबाद हो गया। अब्दुल क़य्यूम अंसारी साहब के नाना हज़रत मौलाना अब्दुल्लाह ग़ाज़ीपुरी आलिमें दीनसुफी बु़जुर्ग थे उनकी माता जी मोहतरमा सफ़िया ख़ातून हाफ़िज़े र्कुआन और आलिमा व फ़ाज़िला थीं वह इतने ज़हीन थे कि 8 साल की उम्र में उर्दू, अरबी, फ़ारसी और दीनयात का अच्छा ख़ासा ज्ञान हासिल कर लियाउनके केवल 12, 13 वर्ष की आयु से ही वतन की आज़ादी का ज़ज़्बा उनके दिल में अंगड़ायी लेने लगा जब वह सिर्फ़ 14 बरस के थे सहसराम हाई स्कूल के छात्र थे कि 1919 ई0 में मौलाना मुहम्मद अली जौहर, मौलाना मुहम्मद अली शोक़त के साथ आज़ादी की तहरीक का हिस्सा बन गये। 1920 ई0 में 15 साला अब्दुल क़य्यूम अंसारी ढहरी आनसोन की तहरीके आज़ादी के अहम ओहदेदार हो गये और उसी साल कांग्रेस के विशेष सम्मेलन कलकत्ता में सूबा बिहार से डेलीगेट की हैसियत से शरीक हुये यही वह गाँधी जी से मिले और वह हमेशा के लिये उनके साथ कांधे से कांधा मिलाकर मुल्क को आज़ादी कराने की तहरीक में कूद पड़े ।
अंग्रेज़ी हुकूमत उनकी तलाश में पीछे पड़ गयी। घर पर पुलिस के छापे पड़े तलाशी हुयीं फ़रवरी 1922 ई0 में अंग्रज़ी पुलिस ने अब्दुल क़य्यूम अंसारी को उनककी बाग़ियाना सरगर्मीयों के कारण गिरफ़्तार कर लिया लेकिन सहसराम ज़िला जेल की सख़्तियाँ भी उन्हें तहरीके आज़ादी से दूर न कर सकीं। 21 साल की उम्र में वह जिस अंगे्रज़ी कॉलेज में पढ़ रहे थे उसी वक़्त मुल्क में गाँधी जी ने असहयोग आआन्दोलन का ऐलान कर दिया तो इनहोने अंग्रेज़ी स्कूल से अलग होकर अपने साथियों के साथ मिलकर अपना देसी स्कूल स्थापित कर लिया इस जद्दोजहद के दौरान कुछ सालों तक उन्होंने अलीगढ़ और कलकत्ता जाकर भी शिक्षा ग्रहण की। वतन की इज़्ज़त और वक़ार के लिये कुछ भी कर गुज़रने को तैयार रहते ।जब अंग्रज़ों ने ज़्यादतियों का शिकार मोमिन बुनकर बिरादरी को बनाया तो अब्दुल क़य्यूम अंसारी जैसे लोग उसके खिलाफ़ उठ खड़े हुये उन्हीं हालात की वजह से 1913 ई0 में कलकत्ता में मोमिन तहरीक की स्थापना हुई जिसके संस्थापकों में ज़्यादातर बिहार के ही लोग थे फिर 1928 ई0 में यह तहरीक आॅल इण्डिया मोमिन कान्फ्रेंस में तब्दील हो गयी । उसके बाद ख़ुद को मोमिन काफ़्रेंस के लिये वक़्फ़ कर दिया और बहुत जल्द बिसाते सियासत पर छा गये। मोमिन बिरादरी उनके गिर्द जमाँ हो गयीं क्योंकि उनकी रहनुमाई में उसे अपने समाजी व सियासी उमंगों के पुरा होने के आसार नज़र आने लगे। आज़ादी के बाद वह बिहार गवर्मेंट में वज़ीर भी बने। 1968 ई0 के असेम्बली के चुनावों वह भारी अकसरियत के साथ ढहरी हलके से कामयाब हुये ।
उन्हें इल्म व अदब से भी गहरी दिलचस्पी थी। ढहरी आनसोन से निकलने वाली हफ़्तावार मैगज़ीन ‘‘अल इस्लाम’’ की एडीटिंग की ज़िम्मेदारी उन्होंने 1991 से लेकर 1929 तक निभाई। 1919 ई0 में माहनामा ‘‘मसावात’’ के संपादक बने। 1919 में रोज़नामा ‘‘साथी’’ और 1925 में इन्होंने माहनामा ‘‘तहज़ीब’’ के एडीटर की सूरत में ज़िम्मेदारी निभाई। अब्दुल क़य्यूम अंसारी साहब ‘‘अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू “से भी वाबस्ता रहे। 1915 से 1951 तक पटना यूनीवर्सिटी के सेनेट फ़ैलो और 1925 में अलीगढ़ यूनीवर्सिटी के कोट मेम्बर रहे। इन्होंने कभी भी अंग्रेज़ी हुकूमत के आगे घुटने न टेके। मुल्क को आज़ादी का परवाना दिलाकर ़आखि़रकार तहरीके आज़ादी का यह कामयाब हीरो 18 जनवरी 1973 ई0 को चुनाव छेत्र के दौरे के दौरान अचानक दिल का दौरा पड़ जाने से हमेशा के लिये दुनिया छोड़ गया और ढहरी आनसोन में इन्हें सुपुर्दे ख़ाक कर दिया गया। हुकूमत हिन्द ने उनके नाम से एक डाक टिकट भी जारी किया है।
मंजरे इसलाम आई0टी0सेल अध्यक्ष जुबैर रजा खान साहब ने कहा कि आजादी के इन सितारो से हमे प्रेरणा लेकर देश को मजबूत करने के कार्य कर आपसी सौहार्द को बढावा देना होगा ।