हज़रत अमीर हमज़ा, हज़रत हंजला सहित जंग-ए-उहद के शहीदों को शिद्दत से किया याद

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।
तंजीम कारवाने अहले सुन्नत के नूरी नेटवर्क शाहिदाबाद गोरखनाथ की ओर से हज़रत अमीर हमज़ा, हज़रत हंजला सहित जंग-ए-उहद के शहीदों का ऑनलाइन उर्स-ए-पाक मनाया गया। क़ुरआन-ए-पाक की तिलावत हुई। नात व मनकबत पेश की गई। युवा उलेमा-ए-किराम ने हज़रत सैयदना अमीर हमज़ा रदियल्लाहु अन्हु, हज़रत सैयदना हंजला रदियल्लाहु अन्हु सहित जंग-ए-उहद के तमाम शहीदों को खिराजे अकीदत पेश किया। इमामे रब्बानी मुजद्दिदे अल्फेसानी हज़रत शैख़ अहमद फ़ारूक़ी सरहिन्दी अलैहिर्रहमां की रूह को भी इसाले सवाब किया गया।
मुख्य वक्ता मौलाना कैसर रज़ा अमज़दी ने कहा कि हज़रत सैयदना अमीर हमज़ा मक्का में पैदा हुए। आपके वालिद का नाम हज़रत अब्दुल मुत्तलिब व वालिदा का नाम हाला है। आप पैगंबर-ए-आज़म हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के चचा और अहले बैत हैं। आप होशियार व बहुत बहादुर थे। जंग-ए-बद्र में बहुत दिलेरी से लड़े। जंग-ए-उहद में हज़रत हमज़ा, हज़रत अली, हज़रत साद बिन अबी वक्कास, हज़रत तलहा, हज़रत अबू दुजाना, हज़रत कतादा, हज़रत अबू तलहा सहित तमाम सहाबा-ए-किराम ने बहुत बहादुरी से काफिरों का मुकाबला किया और पैगंबर-ए-आज़म की हिफाज़त की। हज़रत हमज़ा दोनों हाथों में तलवार के साथ काफिरों का मुकाबला करते रहे। हज़रत हमज़ा इंतेहाइ जोश के साथ तलवार लेकर आगे बढ़े और दुश्मनों को कत्ल करना शुरु किया। आपने 31 काफिरों को कत्ल किया। वहशी नाम के गुलाम ने आपको शहीद कर दिया और हिन्दा ने अपने बाप की मौत का बदला लेने से लिए आपके नाक, कान, हाथ काटे और आपका कलेजा निकालकर चबाया। पैगंबर-ए-आज़म ने आपकी लाश को तलाश करके पहचाना और आपको ‘सैयदुश्शोहदा’ (तमाम शहीदों के सरदार) और ‘असदुल्लाह’ व ‘असदुर्रसूल’ (अल्लाह व रसूल का शेर) का अलकाब अता फरमाया। आपकी शहादत 15 शव्वाल 3 हिजरी में हुई। आपका मजार मदीना में है। पैगंबर-ए-आज़म को आपकी शहादत पर बहुत दुख पहुंचा।
संचालन करते हुए हाफ़िज़ अज़ीम अहमद नूरी ने कहा कि 15 शव्वाल 3 हिजरी को जंग-ए-उहद हुई। पैगंबर-ए-आज़म हर साल उहद के शहीदों की मजार पर तशरीफ ले जाते और वहां फरमाते ‘तुम पर सलाम हो क्योंकि तुमने सब्र किया। तुम्हारा आख़िरत का घर कैसा अच्छा है।’ इसी तरह हज़रत अबूबक्र, हज़रत उमर, हज़रत उस्मान, हज़रत अली हर साल उहद के शहीदों के मजारे मुबारक की जियारत करते थे।
विशिष्ट वक्ता कारी आरिफ रज़ा ने कहा कि जंग-ए-उहद में मुसलमानों की जीत हुई। मुसलमान लश्कर में करीब 700 सहाबा-ए-किराम थे। कुरैश के लश्कर में 3000 लोग थे। करीब 70 सहाबा-ए-किराम शहीद हुए। जंग-ए-उहद में बहादुरी से लड़ कर शहादत पाने वाले हज़रत सैयदना हंजला को फरिश्तों ने गुस्ल दिया। शहीदों को जबले उहद पर दफ़्न किया गया और चंद शहीदों को जन्नतुल बकी में दफ़्न किया गया। हज या उमरा को जाने वाले लोग जब मदीना शरीफ हाजिर होते हैं तब वह जबले उहद पर शहीदों की मजार की जियारत कर दुआ मांगते हैं।
कारी महताब रज़ा ने कहा कि पैगंबर-ए-आज़म ने फरमाया कि उहद पहाड़ हमसे मोहब्बत रखता है और हम उससे मोहब्बत रखते हैं। जंग-ए-उहद में पैगंबर-ए-आज़म के दस्ते मुबारक में एक तलवार थी जिसमें एक शेर लिखा हुआ था जिसका तर्जुमा है ‘बुजदिलीहज़रत में शर्मिंदगी है और आगे बढ़कर लड़ने में इज्जत है, और बुजदिल होकर आदमी तकदीर से नहीं बच सकता’ पैगंबर-ए-आज़म ने फरमाया कि कौन है जो इस तलवार को लेकर इसका हक अदा करे। आपने वह तलवार हज़रत अबू दुजाना को अता फरमाई।
अंत में सलातो-सलाम पढ़कर फातिहा ख़्वानी की गई। मुल्क में अमनो सलामती व कोरोना महामारी से छुटकारे की दुआ मांगी गई।