अपने अधिकारो से जूझती जनपद सन्त कबीर नगर की मीडिया
सन्त कबीर नगर – कहने को तो मीडिया देश के चौथे स्तम्भ है इनकी पहचान निष्पक्ष पत्रकारिता से है ये देश समाज शासन – प्रशासन इत्यादि को चूक पर जरूरत पर आईना दिखाने का काम करते है । लेकिन अब ये प्रशासन के सामने बौने नजर आने लगे है इनकी इतनी भी साहस नही हो रही है कि ये पूछ ले कि हमारे अधिकारो का हनन किस नियम के अन्तर्गत किया जा रहा है ? अगर कुछ साहस होती है तो वह है होहल्ला मचाकर शान्त होने की । यही वह वजह है जनपद की मीडिया को अपने अधिकारो का हनन का सामना करना पड़ रहा है । पुनर्मतगणना के दौरान सभी पत्रकारो का प्रेस पास जारी न होना पहला मौका नही है इसके पूर्व के अवसरो पर भी होते रहा है यह और बात है कि पंचायती चुनाव आदि के अवसरो पर ग्रामीण अंचलो के उन पत्रकारो के भी प्रेस पास जारी हो जाते है जिनके पास संस्था द्वारा निर्गत कोई आई कार्ड तक नही होता है । यही नही पत्रकारो के साथ घटती घटनाओ मे भी कार्यवाई मे एड़ी से चोटी लगाने पड़ते है । आज जिस नगर निकाय चुनाव के मतगणना धांधली के आरोप मे कोर्ट के आदेश पर पुनर्मतगणना के अवसर पर केवल मान्यता प्राप्त पत्रकारो का प्रेस पास जारी होने पर जनपद की मीडिया का सुबह से शाम तक धरने पर बैठने व होहल्ला मचने का नजारा देखा गया है उसके समर्थन मे वो मान्यता प्राप्त पत्रकार नही आये जो पूर्व के वर्षो मे संयुक्त जिला चिकित्सालय मे समाचार संकलन से वंचित होने पर एकजुटता दिखाते हुए एक पखवाड़ा तक आंदोलित होकर जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक के ट्रांसफर का ज्ञापन कमिश्नर को देकर जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन से दूरी बनाकर काम किया था । हालांकि उस आंदोलन का कोई विशेष प्रभाव देखने मे नही आया था सिवाय एक कप चाय पार्टी इंज्वाय के । हालांकि जनपद मे अनेको पत्रकार संगठन है लेकिन ये वैसे ही साबित हो रहे है जैसे पानी पर खीची हुई लकीर का वजूद होता है । अलबत्ता प्रभारी मन्त्री के आगमन पर प्रेस वार्ता का बहिष्कार कर मीडिया का एक समूह ने घटी दुर्व्यवहार की घटना का शिकायती पत्र देकर उचित कार्यवाई की मांग तो किया है लेकिन इसकी संज्ञानता कहां तक होती है के साथ एकता का फूंका हुआ बिगुल कब तक बजता है यह देखने वाली बात होगी । क्यो कि अभी भी पत्रकारो मे एकजुटता की रस्साकस्सी का नजारा जहां कही न कही काम कर रहा है वही प्रभारी मन्त्री द्वारा संज्ञानता की कोई बात नजर नही आयी है ।