सभी ने चार अक्तूबर की रात को उनकी जिद देखी। उनकी धैर्य और राजनीतिक चतुरता का अनुभव किया। जाहिर है वे उस जरूरत को समझ चुकी हैं जिस पर उन्हे खरा उतरना है, और जिसकी उन्हे भूमिका निभानी है। उस रात वे आखिरकार एक राजनीतिक नेता की भूमिका में आ गई थीं।.. लेकिन ठहरे, पहले सोचना होगा कि क्या यह शोर वहां पहुंच रहा है जहां पहुंचना चाहिए? Priyanka Gandhi lakhimpurkheri incident
प्रियंका गांधी का अब शोर हैं और उनकी खबरें लगातार बनती हुई है। इससे पहले उनके बारे में 2019 के लोकसभा चुनाव के समय नियमित सुर्खिया होती थी। उसी समय उन्होने देश की राजनीति में कदम रखा था। उस समय उनकी स्टाइल और तैंवर हल्के थे। मानों भेड़ियों के बीच वे छोड़ी गई, चारों तरफ सत्ता के भूखे अनुभवी और सब अपने-अपने खेल के उस्ताद। लिहाजा, पूर्वी उत्तर प्रदेश की बौतर इंचार्ज कांग्रेस महासचिव के रूप में प्रियका गांधी की कोई खास छाप नहीं छूटी। और चुनाव के अंत होते होते उन्हें एक और बेअसर गांधी की तरह खारिज किया जा चुका था। उन्हें अपनी दादी, लौह महिला इंदिरा गांधी की तरह का विलक्षण नहीं माना गया। उन्हें अपने भाई की तरह अनजाने क्षेत्र में एक ऐसे गांधी की तरह खारिज कर दिया गया जो राजनीतिक रूप से व्यर्थ, मोटे तौर पर अनजान क्षेत्र में लड़खड़ाते हुए बिना दिशा के वैसे ही चलते हुए माना गया जैसे उनके भाई को माना गया।
लेकिन अब वैसा नहीं!
तीन साल बाद, कोई डेढ़ साल के कोरोना काल, लॉक डाउन के गुजरने के बाद प्रियंका गांधी गरजती हुई आई हैं। सधी हुई भाव-भंगिमा, मजबूत व्यवहार, स्वर शक्तिशाली और राजनीतिक इच्छाशक्ति में आक्रामक और एक ऐसे बेफिक्र संकल्प के साथ कि उनके पास गंवाने को क्या हें। तभी सभी ने चार अक्तूबर की रात को उनकी जिद देखी। उनकी धैर्य और राजनीतिक चतुरता का अनुभव किया। जाहिर है वे उस जरूरत को समझ चुकी हैं जिस पर उन्हे खरा उतरना है, और जिसकी उन्हे भूमिका निभानी है। उस रात वे आखिरकार एक राजनीतिक नेता की भूमिका में आ गई थीं। आधी रात के समय उत्तर प्रदेश पुलिस से उनका सामना हुआ और जब उन्हे हिरासत में रखा गया तो झाड़ू लगाने का उनका वीडियो संदेश जहा सरकार को खामियाजे की चेतावनी देने वाला था तो जनता को सरकार की मनमानी की जानकारी देने के साथ व्यक्तित्व की सहजता का बतलाना भी थी। वह सही तरीके से मौन भाव मचाया गया शोर था। प्रियंका ने सब कुछ सही समय, सही मंच पर किया।
Priyanka Gandhi lakhimpurkheri incident
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और फिर गले लगना। ऐसा दृश्य पहले तब दिखा था जब वे 19 साल की दलित महिला के परिवार वालों से मिलने गई थीं। एक साल पहले हाथरस में इस युवती के साथ सामूहिक बलात्कार करके उसकी हत्या कर दी गई थी। गले लगने का वैसा ही दृश्य हमने तब भी देखा जब वे किसान आंदोलन के दौरान मारे गए किसानों में से एक के परिवार से मिलने गईं थी।
गले लगने की यह तस्वीर सोशल मीडिया पर खूब साझा हुई, हिचकिचाते हुए अखबारों ने भी छापा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से संबंधित खबरों के रहते और उसके बावजूद उसे प्रसारित किया गया। गले लगने की इस छवि का शोर बहुत ज्यादा रहा।
जी हां, प्रियंका गांधी का हाल में काफी शोर हुआ है। उनकी आवाज, उनके तैंवर, भागदौड को ले माना जाने लगा है कि वे कांग्रेस को फायदा पहुंचा रही है। वे पार्टी और उसके कार्यकर्ताओं में एक नई ऊर्जा और उत्साह भर रही है। यह ऐसा शोर है जो विपक्ष को हिला रहा है जिसने एक समय प्रियंका गांधी को चांदी के चम्मच वाला एक ट्रैनी माना था। लेकिन अब उनके मचाए शोर के बारे में राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह उत्तर प्रदेश के आगामी चुनाव की दशा दिशा बदल सकता है।
लेकिन ठहरे, पहले सोचना होगा कि क्या यह शोर वहां पहुंच रहा है जहां पहुंचना चाहिए? इस शोर को हंगामे की तरह देखा जा रहा है या यह जहां जाना चाहिए वहां जाने से पहले जाम हो जा रहा है, रूक रहा है, उसे रोका जा रहा है?
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चुनाव के लिहाज से उत्तर प्रदेश एक मुश्किल क्षेत्र है, जाति और दूसरी जटिलताओं में जकड़ा हुआ। एक तरफ पहचान आधारित पार्टियों का प्रभुत्व है तो दूसरी तरफ इस समय हिन्दुत्व के नैरेटिव का बोलबाला है। इनमें हिंदू नैरेटिव ज्यादा बड़े क्षितिज पर हावी है। इसलिए, प्रियंका का जो शोर हैं वह हल्का लगता है। उनकी चंदन लगी ललाट हिंदुओं में खबर नहीं बन रही है बल्कि पीड़ित अल्पसंख्यकों के परिवार के लोगों से गले लगना सुर्खियों में है। काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा करने की उनकी तस्वीर उतनी लोकप्रिय नहीं हो रही है जितनी वाल्मीकि कॉलोनी में झाड़ू लगाने की हुई। वजह वही है जिसका माहौल इस समय देश में है। हम उस मूड को न भूलें जो इस समय देश में है। मतदाता बदल चुके हैं और उनके साथ आईडिया ऑफ इंडिया भी बदल गया है तथा राजनीति भी।
हम एक बंटे हुए देश में रह रहे हैं जहां राजस्थान में पहलू खान को भीड़ द्वारा मार दिए जाने से वैसा ही विभाजन है, वह वैसा ही निर्णायक है जैसे कश्मीर में माखन लाल बिन्द्रू की हत्या। हम एक ऐसे देश में रह रहे हैं जहां दिमाग में तालिबान, खालिस्तान और इनके भारत पर खतरे की चर्चा भरी हुई है। हम एक ऐसे समय में रह रहे हैं जब दीवारों पर लिखा हुआ अभी भी मोटा और गेरुआ है। हिन्दू कार्ड खेलिए, हिन्दू रहिए, दुश्मन को चिन्हित कीजिए, उनपर हमला कीजिए या युद्ध हार जाइए। अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण, गले लगना, एकजुटता, सहानुभूति, अनुकंपा, गुंडा राज को निशाना बनाना, उनके अत्याचार की याद दिलाने की उचित कार्रवाई – ये सब ट्वीटर पर चर्चा, शहरी शिक्षितों, दक्षिण दिल्ली और मुंबई वालों के लिए तो ठीक है। पर मेरे मौसा और आपके ताऊ का क्या होगा? भीलवाड़ा में मेरे मौसेरे और गाजीपुर में आपके चचेरे भाईयों का क्या होगा? इनके जहन में बैठा मुद्दा है कि जब वे अपनी तलवार लेकर हमपर हमला बोलने आएंगे तो हमारी रक्षा कौन करेगा?
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इसमें दो राय नहीं है कि प्रियंका का गरजना और नेतृत्व का उनका प्रदर्शन पार्टी के भीतर राजनीतिक निर्णय है, सरगर्मी है। पार्टी के अंदर निष्क्रिय नेताओं में हलचल है, कार्यकर्ता अपनी जगह वापस पाने की इच्छा जता रहे हैं। साथ में कई जाति समूहों, वंचितों के अच्छे-खासे वर्ग को अपने साथ सुदृढ़ करने की निश्चित रणनीति भी दिखलाई देती है। पर शोर क्या सही है, और इससे भी महत्वपूर्ण क्या वास्तव में इससे आगामी विधानसभा चुनाव की दिशा बदलेगी?
बहरहाल, महामारी के बाद मूड थोड़ा बदला भर है। यह लंबे समय में पहली बार हुआ है। सर्दी गर्म और शोर-शराबे वाली होने वाली है और शायद 2021 का अंत किसी धमाके से न हो! Priyanka Gandhi lakhimpurkheri incident