यह महज संयोग है कि पंजाब के मुख्यमंत्री पद से हटाए गए कैप्टेन अमरिंदर सिंह दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल से मिले और उसके दो हफ्ते के अंदर ही गृह मंत्रालय ने पंजाब, असम और पश्चिम बंगाल में सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ की गश्त और जांच का दायरा बढ़ा दिया। यह भी संयोग ही है कि चार महीने बाद पंजाब में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। केंद्र सरकार का यह फैसला हो सकता है कि तथ्यों पर आधारित हो और वस्तुनिष्ठ तरीके से लिया गया हो लेकिन इसका तात्कालिक कारण कैप्टेन अमरिंदर सिंह की ओर से दी गई सूचनाएं हैं और इसी कारण पहली नजर में यह राजनीतिक फैसला प्रतीत होता है, जिसकी सफलता पहले दिन से संदिग्ध है। (BSF expanded border area)
बीएसएफ अभी पंजाब में भारत और पाकिस्तान की सीमा से 15 किलोमीटर अंदर तक गश्त करती थी, जिसे बढ़ा कर 50 किलोमीटर कर दिया गया है। असम और पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश की सीमा पर बीएसएफ के अधिकार क्षेत्र का दायरा बढ़ा कर 50 किलोमीटर किया गया है। गुजरात में पहले यह दायरा 80 किलोमीटर का था, जिसे घटा कर 50 किया गया है। केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर व लद्दाख पूरी तरह से बीएसएफ के अधिकार क्षेत्र में आ गए हैं। इसके अलावा नगालैंड, मेघालय, मिजोरम, मणिपुर और त्रिपुरा भी पूरी तरह से बीएसएफ के अधिकार क्षेत्र के दायरे में आ गए हैं। बीएसएफ कानून 1968 की धारा 139 के तहत सीमा सुरक्षा बल को ऐसी शक्तियां मिली हुई हैं कि वह अपने अधिकार क्षेत्र में किसी की तलाशी ले सकती है, कहीं भी छापा मार सकती है, सामानों की जब्ती कर सकती है और किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है। इसके लिए उसे स्थानीय पुलिस से सलाह-मशविरा करने की जरूरत नहीं है। हां, यह जरूर है कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को वह पुलिस के हवाले करेगी और अभियोजन का काम पुलिस का होगा। इसी आधार पर सरकार के फैसले को न्यायसंगत ठहराया जा रहा है और कहा जा रहा है कि पुलिस और बीएसएफ के काम में टकराव नहीं होगा और न पुलिस के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण होगा।
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लेकिन यह सिर्फ कहने की बात है। राज्य की सीमा के अंदर, खास कर छोटे राज्यों की सीमा के अंदर कहीं भी केंद्रीय बलों की तैनाती होती है तो वह तनाव पैदा करती है। यहीं कारण है कि नरेंद्र मोदी ने खुद गुजरात का मुख्यमंत्री रहते केंद्र के इस कदम का विरोध किया था। उन्होंने राज्य की सीमा में बीएसएफ के अधिकार क्षेत्र का दायरा बढ़ाने के खिलाफ 2012 में तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखी थी और आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार राज्य के भीतर एक और राज्य बना रही है। सोचें, अब ऐसा क्या हो गया कि बीएसएफ का दायरा बढ़ाने से राज्य के भीतर एक और राज्य नहीं बनेगा? जो स्थितियां 2012 में थीं वहीं स्थिति अब भी हैं। अब भी राज्य के अंदर 50 किलोमीटर के दायरे में केंद्रीय बल को गश्त करने या जांच, जब्ती, गिरफ्तारी का अधिकार देने से राज्य की पुलिस के अधिकार कम होंगे और उसके कामकाज में बाधा आएगी। यह स्पष्ट रूप से राज्य के अधिकार का अतिक्रमण होगा।
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कानून व्यवस्था राज्य का अधिकार है और इसके लिए उसके पास अपनी पुलिस होती है। अगर सीमा के बहुत अंदर तक और बहुत सघन आबादी वाले क्षेत्र में केंद्रीय बलों की तैनाती होती है तो यह राज्य या नागरिक क्षेत्र का सैन्यकरण करने की तरह होगा। यह सही है कि सीमा की सुरक्षा केंद्र की जिम्मेदारी है लेकिन सीमा सुरक्षा के नाम पर छोटे-छोटे राज्यों में भी 50 किलोमीटर अंदर तक केंद्रीय बलों को अधिकार देना न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता है। तभी इस फैसले को लेकर सवाल उठ रहे हैं। बड़ा सवाल यह है कि ऐसी क्या तात्कालिक चुनौतियां हैं, जिनकी वजह से यह फैसला करना पड़ा है? क्या सरकार सिर्फ तस्करी या घुसपैठ रोकने के लिए सीमा के 50 किलोमीटर अंदर तक बीएसएफ को अधिकार दे रही है? या इसका मकसद आंतरिक सुरक्षा में केंद्रीय बलों का दखल बढ़ाना है? अगर ऐसा है तो यह बहुत खतरनाक शुरुआत है। इससे आम नागरिकों के अधिकारों का भी हनन होगा।
सरकार सीमा पार से आने वाले ड्रोन्स का खतरा बता रही है लेकिन क्या कोई ऐसा ड्रोन पकड़ा गया है, जिसकी उड़ने की क्षमता 20 किलोमीटर से ज्यादा हो? चाहे जम्मू कश्मीर में मार गिराए गए ड्रोन हों या पंजाब की सीमा पर पकड़े गए ड्रोन हों, इन सबकी क्षमता 20 किलोमीटर से कम की थी। यानी सीमा पार से उड़ कर ये ज्यादा से ज्यादा भारत में 10-15 किलोमीटर तक अंदर आ सकते हैं। इस लिहाज से भी दायरा बढ़ा कर 50 किलोमीटर करने का कोई मतलब नहीं है। दूसरी अहम बात यह है कि अगर सीमा पर ड्रोन नहीं दिखाई देंगे या सीमा के अंदर 15 किलोमीटर तक बीएसएफ के जवान उनको नहीं देख पाएंगे तो इस बात की क्या गारंटी है कि वे 50 किलोमीटर अंदर दिखाई देंगे? इसी तरह से अगर बीएसएफ सीमा पार से नशीले पदार्थ लेकर या हथियार लेकर घुसपैठ कर रहे किसी आतंकवादी, घुसपैठिए या तस्कर को सीमा पर ही नहीं पकड़ लेगी या सीमा के अंदर 10-15 किलोमीटर के दायरे में नहीं पकड़ लेगी तो तय मानें कि 50 किलोमीटर अंदर सघन आबादी वाले क्षेत्र में आने के बाद उन्हें नहीं पकड़ा जा सकेगा। अगर उन्हें पकड़ने के लिए बीएसएफ 50 किलोमीटर अंदर तक आती है तो तस्कर पता नहीं पकड़ा जाएगा या नहीं लेकिन आम लोगों की परेशानी जरूर बढ़ेगी।
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सरकार का यह फैसला बीएसएफ की सक्षमता पर भी बड़ा सवाल है। कैप्टेन अमरिंदर सिंह कह रहे हैं कि सीमा पार से घुसपैठ और हथियारों व नशीले पदार्थों की तस्करी बढ़ गई है। बंगाल को लेकर भाजपा के नेता कह रहे हैं कि राजनीतिक मकसद से घुसपैठियों को पनाह दिया गया है। अगर ऐसा है तब भी बड़ा सवाल बीएसएफ पर ही है कि वह क्या कर रही थी, जो पंजाब की सीमा पर पाकिस्तान से तस्करी बढ़ गई और बंगाल में बांग्लादेश की सीमा से घुसपैठ होती रही? अगर बीएसएफ तमाम मुस्तैदी के बावजूद सीमा पर घुसपैठ, तस्करी या ड्रोन को नहीं रोक पा रही है तो 50 किलोमीटर तक दायरा बढ़ाने के बाद कहां से रोक पाएगी! इसमें दोष बीएसएफ का नहीं है। भारत की इतनी लंबी सीमा है कि जवान मैनुअल तरीके से पूरी तरह चौकस निगरानी कर ही नहीं सकते हैं। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह जवानों की संख्या बढ़ाए और उन्हें आधुनिक तकनीक मुहैया कराए। तकनीक के सहारे सीमा के आसपास उड़ने वाले ड्रोन्स पर नजर रखी जा सकती है और उन्हें मार कर गिराया जा सकता है। सीमा की बाड़ेबंदी करके, आधुनिक सेंसर लगा कर और कैमरे आदि की व्यवस्था करके घुसपैठ को रोका जा सकता है। खुफिया तंत्र को बेहतर बना कर भी सीमा पार से होने वाले किसी नापाक अभियान को विफल किया जा सकता है। लेकिन यह सब करने की बजाय सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा का बहाना बना कर राज्यों के अधिकार क्षेत्र में दखल दे रही है।