श्रीनगर में इकलौते कृष्णा ढाबे के हिंदू मालिक के बेटे से लेकर बिंदरू की हत्या के वाकयों में और आज फिर दिन-दहाड़े दो हिंदू अध्यापकों की स्कूल में हत्या की वारदात संकेत है कि घाटी में आईएसआई-आतंकियों ने तालिबानी रूख अपना लिया है। यदि अब भी मोदी-शाह ने इजराइली एप्रोच के अनुसार दबंगी से घाटी की बुनावट को बदलने में करो-मरो का व्यवहार नहीं अपनाया तो वह वक्त दूर नहीं जब भारत भागेगा।… और भारत को रहना भी क्यों चाहिए उस घाटी में जो 200-500 हिंदुओं को सुरक्षित जीने नहीं दे सकती? यदि घाटी के 80 लाख मुसलमान अफगानी तालिबानी अंदाज को ही सच्चा इस्लामी जीवन, आजादी मानते हैं तो भारत क्यों इन्हें इंसानियत से रखने में अपनी ताकत, पैसा झोंके! अपनी बरबादी कराए! Kahmir militants target civilians
ऐसा दस या बीस-तीस साल बाद कभी भी हो लेकिन होगा क्योंकि कश्मीर घाटी में मोदी, शाह, डोवाल फेल होते हुए हैं और हिंदुओं में वह समझ, हिम्मत, मर्दानगी, रोडमैप कतई नहीं है, जैसी इजराइल के यहूदियों में है। मैं फिलहाल दुखी, व्यथित और सच्चाई में रोता हुआ हूं। मेरे सामने श्रीनगर में माखन लाल बिंदरू और बिहार के गरीब गोलगप्पे बेचने वाले हिंदू पवन वर्मा की हत्या के फोटो हैं। मंगलवार को जब बिंदरू की इकबाल पार्क के पास हत्या हुई थी तब मेरी बेटी के ससुर याकि दामाद आशीष के 70 वर्षीय पिता और उनकी मां घटनास्थल के बगल की किसी दुकान में सामान खरीदने गए थे। मेरे ये समधी इस जिद्द से श्रीनगर में रह रहे हैं कि कुछ भी हो जाए वे घाटी छोड़ दूसरी जगह नहीं जाएंगे। वैसी ही जिद्द माखन लाल बिंदरू की थी। नब्बे के दशक के भयावह खौफ में भी बिंदरू और उनका परिवार श्रीनगर से नहीं भागा। उस नाते बिंदरू हिंदू नस्ल का वह बिरला चेहरा हैं, जिसे मैं डरपोक नहीं मान सकता। मैं मानता हूं कि जब आतंकी की गोली से बिंदरू अंतिम सांस ले रहे होंगे तब भी दिमाग में पछतावा नहीं होगा। उन्होंने सुकून से अपनी मिट्टी में अंतिम सांस ली होगी।
लेकिन सत्य तो सत्य कि भारत का राष्ट्र-राज्य इस हिंदू की सुरक्षा में नाकाम, नालायक और कायर साबित हुआ। तभी कश्मीर की दास्तां में शेष भारत के हिंदुओं से यह जो सुनने को मिलता था कि कश्मीरी पंडित कायर थे जो भागे लेकिन माखन लाल बिंदरू के उदाहरण से क्या ऐसा मानना सौ टका झूठा नहीं साबित? गवर्नर जगमोहन हों या मनोज सिन्हा, नरेंद्र मोदी-अमित शाह का राज हो या वीपी सिंह का इन सबकी कथित छप्पन इंची छाती ने कश्मीरी हिंदुओं को वह सुरक्षा कब और क्या दी, जिससे वहां जीवन जीये हिंदुओं के डरपोक होने का ख्याल बनाए? श्रीनगर में इकलौते कृष्णा ढाबे के हिंदू मालिक के बेटे से लेकर बिंदरू की हत्या के वाकयों में और आज फिर दिन-दहाड़े दो हिंदू अध्यापकों की स्कूल में हत्या की वारदात संकेत है कि घाटी में आईएसआई-आतंकियों ने तालिबानी रूख अपना लिया है। यदि अब भी मोदी-शाह ने इजराइली एप्रोच के अनुसार दबंगी से घाटी की बुनावट को बदलने में करो-मरो का व्यवहार नहीं अपनाया तो वह वक्त दूर नहीं जब भारत भागेगा।
और भारत को रहना भी क्यों चाहिए उस घाटी में जो 200-500 हिंदुओं को सुरक्षित जीने नहीं दे सकती? यदि घाटी के 80 लाख मुसलमान अफगानी तालिबानी अंदाज को ही सच्चा इस्लामी जीवन, आजादी मानते हैं तो भारत क्यों इन्हें इंसानियत से रखने में अपनी ताकत, पैसा झोंके! अपनी बरबादी कराए!
बहरहाल, मैं ईश्वर की कसम खा कर सच लिख रहा हूं कि 15 अगस्त को जब काबुल में तालिबान की जीत और अमेरिका के भागने की खबर आई तो मैं घाटी के मुसलमानों पर इसका प्रभाव सोच हिला। मैंने तभी माना अनुच्छेद 370 खत्म होने का असर अब खत्म। अलगाववादी-आतंकी वापिस खौफ बनाने में जुटेंगे। मैं क्योंकि हाल में घाटी में घूमा हूं, हिंदू-मुस्लिम-पंडित सर्कल से खबर लेता हुआ हूं तो उरी में नई घुसपैठ के साथ मेरा अंदेशा बना कि श्रीनगर के बचे-खुचे हिंदू निशाने में आ सकते हैं। और तथ्य कि कोई पंद्रह दिन से श्रीनगर में हिंदू के बचे हुए नामी नाम धर मेडिकल, शक्ति स्वीट्स व बिंदरू पर खतरे की आंशका थी। आंतकियों-अलगाववादियों ने कुछ ठाना है, इसकी भनक में एक दिन मुझे मालूम हुआ कि मेरे रिश्तेदार जहां रहते हैं वहां रात में सुरक्षा बल पहुंचा, लाइटें बंद करा दीं। पूरी रात चौकसी हुई तो समझ आया हिंदुओं पर खतरा सचमुच आ गया। अब यह संभव नहीं कि खुफिया एजेंसियों, गवर्नर हाउस, सुरक्षा बलों, पुलिस अफसरों को आतंकी हलचल की सुगबुगाहट न हो। लेकिन क्या हुआ? मंगलवार को श्रीनगर में उस जगह दिन दहाड़े माखन लाल बिंदरू की हत्या कर दी गई, जहां नब्बे के दशक में असंख्य ग्रेनेड हमलों के बावजूद बिंदरू परिवार भागा नहीं था। वह कसम लिए हुए था कि जीना यहां मरना यहां।
लेकिन पता है आपको कि स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया ने बिंदरू की खबर को दबाया! दिल्ली में भी उस दिन केवल ‘नया इंडिया’ में खबर थी। प्रशासन-सरकार सबने हत्या को ऐसे दबाया, जैसे कुछ नहीं हुआ। जो हिंदू लंगूर घाटी से दूर बैठ कर श्रीनगर में जन्माष्टमी के प्रायोजित फोटो को सोशल मीडिया में डाल सब कुछ ठीक होने का झूठ बनाते हैं उनमें भी बिंदरू याकि हिंदू की हत्या के सत्य की चर्चा कराने का साहस नहीं।
और तय मानें घटना का नरेंद्र मोदी, अमित शाह व अजित डोवाल पर भी असर नहीं हुआ होगा। जबकि वहां हिंदू लोग खौफ में अधमरे हो गए होंगे? हां, आशीष भी दस दिन से चिंता करते हुए है कि माता-पिता मान नहीं रहे हैं कि वे उधमपुर शिफ्ट हो जाएं। बिंदरू की हत्या के बाद अगल-बगल के गिने-चुने हिंदू परिवारों में वापिस नब्बे के दशक वाली दहशत है। पता नहीं अगली गर्मियों तक लाल चौक एरिया के हिंदुओं में दो-चार परिवार भी बचें या नहीं!
सोचें, एक तरफ श्रीनगर में तीन-चार लाख सेना-सुरक्षा बल व पुलिस तो राजभवन में पूर्वांचल के बैठे हिंदू उप राज्यपाल व अफसरों की भीड़ वहीं ठीक विपरीत शहर में मुसलमानों के बीच कश्मीरियत वाले चंद हिंदुओं का जीना! भला इनका जीवन अनुच्छेद 370 होने या खत्म होने का क्या मतलब लिए हुए है? तब भी हिंदू मरते-भागते हुए थे और लगभग पूरी तरह भाग चुकने के बाद अब बचे चंद हिंदू भी वापिस वैसे ही मरते हुए! वैसे ही खौफ में जीते हुए! तभी घाटी में यदि हिंदू की भागना ही नियति है तो सोचे भारत का भागना भी कितना रूका रहेगा?
खौफ क्या होता है इसे कभी श्रीनगर, अनंतनाग में अकेले जा कर अनुभव करें। जैसे आशीष के पिता जिद्दी (बीमारी के बाद आंखों से साफ न दिखलाई देने के बावजूद पत्नी को साथ लेकर श्रीनगर में बेफिक्री से घूमते और मुसलमानों से सहज व्यवहार, मेलजोल) हैं वैसे मैं भी कुछ जिद्दी हूं। मैं कोई बीस दिन घाटी में घूमते हुए लावारिस मंदिरों की तलाश, उन्हें देखने, जगह कब्जाए मुसलमानों से बात करते हुए झिझका नहीं, चिंता हावी नहीं हुई कि कहीं कुछ हो न जाए। बावजूद इसके एक दिन लाल चौक के घंटाघर पर लगी नई लाइट को देखने की उत्सुकता में रात दस-सवा दस बजे अपनी पत्नी के साथ पैदल घूमने निकला तो लौटते वक्त जब तीन-चार मुस्लिम नौजवानों को लगातार पीछे आते देखा तो मुझे भी फुरफुरी हुई….ये पीछे क्यों आ रहे हैं? पीछे मुड़ कर टोकूं या …जल्दी चलें, घर पहुचें और चैन की सांस लें।…
खौफ अच्छे-अच्छों को तोड़ देता है और घाटी यदि दशकों से हिंदुओं के लिए मौत का कुआं है तो माखन लाल बिंदरू की हत्या भविष्य का क्या संकेत है? सवाल कचोटता हुआ है क्योंकि नरेंद्र मोदी, अमित शाह, अजित डोवाल के अनुच्छेद 370 को खत्म करने के सूरमाई करतब के बावजूद आज श्रीनगर में हिंदू खौफ में हैं न कि मुसलमान! मैं अनुच्छेद 370 खत्म करने का पैरोकार रहा हूं लेकिन सपने में नहीं सोचा था कि उसके बाद भी घाटी में हिंदुओं की सुरक्षा नहीं होगी। उनकी वापसी नहीं होगी। उनकी जमीन-जायदाद से कब्जे नहीं हटेंगे या लावारिस मंदिरों को संरक्षण नहीं मिलेगा। हकीकत है कि अनुच्छेद 370 खत्म करने के बाद घाटी को इस्लामियत के घेटो से बाहर निकालने का एक काम नहीं हुआ है। क्या सरकारी दफ्तरों में तिरंगा फहरा देने से या जन्माष्टमी मनाए जाने के प्रायोजित फोटो के हल्ले से घाटी सामान्य हो जाएगी?
नहीं! असलियत है कश्मीर घाटी जस की तस है। बतौर गृह मंत्री अमित शाह ने माना हुआ है कि अनुच्छेद 370 खत्म कर दी तो सब हो गया। उन्होंने न वहां प्रशासन बदला और न काबिल अफसर (जो चौबीसों घंटे घाटी के चरित्र को बदलने का संकल्प लिए हुए हों) तैनात किए। श्रीनगर का अफसरान तंत्र ढीला-ढाला वैसा ही है जैसे लखनऊ-पटना में होता है। श्रीनगर में हिंदू राज्येंद्रियों की भयाकुलता, बुद्धिहीनता और अल्पकालिकता का आज प्रतिनिधि गवर्नेंस है। प्रशासन में वह मैनपॉवर नहीं है, यह संकल्प नहीं है कि जितनी जल्दी हो सके और जितनी सख्ती हो सके वह करके घाटी को 1990 से पूर्व की स्थिति में लौटाएं।
बिंदरू की हत्या, गोलगप्पे वाले की हत्या, दो अध्यापक हिंदुओं की हत्या के बावजूद मोदी, शाह, डोवाल में इतनी मर्दानगी भी नहीं जो घटना के तुरंत बाद एरिया में या श्रीनगर में नेट बंद करके कर्फ्यू लगाए, घर-घर तलाशी ले कर हथियार-आंतकी तलाशे और सेर के जवाब में सवा सेर खौफ बनाए। या यह संकल्प बने कि सब हिंदुओं को शहर से निकाल राजभवन, सेना के साथ बगल की पहाडी में मकान खाली करा वहा उन्हे बसाए। नई बस्ती बसाएं। एक हिंदू की मौत के बदले हजार हिंदू (कहां है आरएसएस के स्वंयसेवकों की कथित सेना) वहां ले जा कर बसाएं। तथ्य है, सत्य है कि इजराइल में यदि कोई एक यहूदी आंतकी हमले में मारा जाता है तो वह तुरंत ऐसे ही धकपकड़ या हमास आदि के आंतकी घरों, ठिकानो पर सीधे राकेट दागता है। जबकि अमित शाह, डोवाल ने क्या किया हुआ है? धारा-370 खत्म करने से किला जीत लेने के मुगालतों में इन्होने श्रीनगर में लोकल खुफिया तंत्र चौपट कर डाला, पूर्वांचल के निकम्मे अफसर बैठा दिये जो जन्माष्टमी के झूठे फोटो चलवाते है, लीरीक्स बनवा टाइमपास करते है और तमाम तरह के इनपुट के कागजों, नोटो को दबाकर बैठे रहते है। कहते है ये उपराज्यपाल मनोजसिंहा तक से इनपुट, कागज छुपाते है।
तभी तय माने आने वाले दिनो में घाटी में एक के बाद एक हिंदुओं की बेइंतहा हत्या होगी। आज दो हिंदू अध्यापकों की हत्या की घटना ने इस आंशका के सही होने का खटका बनाया है कि नए आंतकी संगठन ने घाटी में सौ हिंदुओं को मारने का टारगेट बनाया है। वह पूरा हुआ और फिर तालिबानी लडाको का सैलाब बनेगा। एक तरह से श्रीनगर में हत्याओं का सिलसिला मोदी की कथित हिंदूवादी सरकार को आंतकी ललकार है तो जवाब में क्या अमित शाह व डोवाल को श्रीनगर में बैठ कर एक-एक घर की तलाशी करवा कर जवाबी खौफ नहीं बनवाना चाहिए? घाटी में लाखों की संख्या के सुरक्षा बल को चप्पे-चप्पे में उतार कर आबादी के अलग-अलग बाड़े अब क्या नहीं बनवा देने चाहिए? क्या देश-दुनिया को बताना नहीं चाहिए कि घाटी को अब इजराइली एप्रोच से हैंडल किया जाएगा।
मगर मोदी, शाह, डोवाल बातों के कागजी शेर है। ये घाटी के बाहर हिंदुओं को बहकाने, उनमें पानीपत की लड़ाई का हल्ला बना कर वोट बंटोरना जानते है लेकिन रियल इस्लामी चरमपंथी की चुनौती के आगे जा कर लडने वाले रियल योद्धा नहीं। सोचे, श्रीनगर में लाखों का सैनिक-पुलिस बल, ऊपर से मोदी-शाह की छप्पन इंची छाती का शोर, धारा-370 हटने का खौफ बावजूद इसके वहा चंद आंतकी और आईएसआई एजेंट दिनदहाड़े हिंदुओं को मारते हुए!
जाहिर है अमित शाह, अजित डोवाल ने अपने आत्मविश्वास में श्रीनगर की पुलिस, रॉ, आईबी खुफिया निगरानी, सैनिक इंटलिजैंस में मेनपॉवर की ऐसी कोई गडबडी की है जिससे इस्लामी चरमपंथियों-आंतकियों का हौसला आसमा छूता हुआ है। मोदी-शाह- डोवाल ने तमाम पुराने अनुभवियों, जमीनी पकड़ वाले अफसरों- जानकारों को इधर-उधर शंट कर ऐसे लापरवाह, बुजदिल लोग बैठा दिये है जिससे खुफिया तंत्र फेल है और लोकल पुलिस निठल्ली। मुख्य सचिव से लेकर सलाहकार सब डफर और बुजदिल है। शायद ऐसा दिल्ली के गृह मंत्रालय के चाहने से भी संभव है। दिल्ली के गृह मंत्रालय में भी घाटी को दुरस्त करने के आर-पार की लड़ाई का संकल्प लिए कौन है? वहां भी तो प्राथमिकता चुनाव और वोट है।
तभी श्रीनगर के सचिवालय में, जिला मुख्यालयों में अभी भी सुन्नी बहुल अफसरशाही चुपचाप वह हर काम कर रही है, जिससे हिंदू की सुनवाई नहीं हो और कट्टरपंथियों का हौसला बढ़े।। सोचे धाकड़ एसएसपी संदीप के दफ्तर से सौ मीटर दूर, सीआरपीएफ की चौकी से पचास मीटर दूर बिंदरू की हत्या हुई जबकि थ्रेट मालूम था। लेकिन थानों में जब सारे पुराने कारिंदे हैं तो किसे पड़ी थी जो हिंदू पर खतरे की चिंता बने। तभी समझ नहीं आता कि दिल्ली के अमित शाह या उनके नीचे कश्मीर देख रहे अफसर विजय कुमार जम्मू क्षेत्र के तमाम हिंदू थानेदारों-कारिंदों को घाटी के चार जिलों में ट्रांसफर करके और वहां के लोगों को जम्मू इलाके में भेज कर कायाकल्प क्यों नहीं कर सकते? क्यों नहीं ऐसी इच्छाशक्ति? जब अनुच्छेद 370 हटाने का विरोध-शोर झेल लिया तो घाटी को पूरी तरह खंगाल देने में क्या डर? मैंने इसी सीरिज की शुरुआत में लिखा था कि घाटी के जनजीवन का थाना, तहसील, पंच-सरपंच, पटवारी, तहसीलदार, सचिव सब इस्लामियत में रंगे हुए हैं और मदरसों-स्कूलों के टीचर, जमात-तबलीगी प्रचारकों ने हर लेवल पर अपनी गिरफ्त बनाई हुई है। कश्मीर घाटी का सत्य है कि 1990 से हिंदू तो भगाए ही गए, साथ ही उनकी रिहायशी और खेतीहर जमीन, बिजनेस-दुकानों सब पर पूरा कब्जा मुस्लिम आबादी का बनवाया गया। रेवेन्यू रिकार्ड, लैंड रिकार्ड, बिक्री-खरीद के रजिस्ट्रार ऑफिस में एसडीएम, तहसीलदार, पटवारियों ने उग्रवादियों से भी अधिक जुनून के साथ फर्जी दस्तखतों से संपत्तियां ट्रांसफर कराईं।
क्या अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद इसका दो टूक सामना करते हुए भारत सरकार को घाटी के प्रशासन का मैनपॉवर बदलना या उसके ट्रांसफर का फैसला नहीं लेना था? किस बात का डर है? जब दुनिया के आगे छपन्न इंची छाती फुलाए हुए हैं, देश भर में दबंगी दिखा रहे हैं तो, जहां दिखानी चाहिए वहा दिखाने की बजाय हिंदुओं की हत्याओं को छुपाना, उनके हवाले दुनिया को आगाह न करना क्या मतलब रखता है? कृष्णा ढाबे के मालिक के बेटे की दिन-दहाड़े हत्या से लेकर बिंदरू की हत्या की हर घटना को दुनिया के आगे प्रचारित करके हमें बताना था कि अब हम और बरदाश्त नहीं कर सकते। दुनिया हमें न कोसे, बल्कि आईएसआई-तालिबानी-आतंकियों की करतूतें देखें। लेकिन नरेंद्र मोदी, अमित शाह, अजित डोवाल ने उलटी नीति अपनाई हुई है। ये हिंदुओं की हत्या की खबरों को दबवाते हैं और जन्माष्टमी की झांकी का हल्ला कराते हैं ताकि देश के हिंदू उल्लू बनें और घाटी में साहस के फैसलों से बचे रहें।
ध्यान रहे ऐसे ही अमेरिका ने भी अफगानिस्तान में झूठी झांकियां देख माना था कि सब ठीक। मिशन कामयाब। और क्या नतीजा निकला? भागना पड़ा!
मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि मैं गलत साबित होऊं। लेकिन मैं दीवार पर लिखा देख रहा हूं कि मोदी-शाह-डोवाल से घाटी उलटे तालिबानियत की और जाती हुई है। जाने यह तथ्य कि तालिबानी जीत ने पश्चिमी किनारे के फिलस्तीनियों में भी उन्माद बनाया था, हमास आदि के आंतकी हमले बढ़े लेकिन इजराइल ने जवाब दो टूक दिया। इजराइल लगातार मुस्लिम-यहूदी इलाकों की बुनावट को बदलता हुआ है। एक यहूदी मरता है तो नेतन्याहू की सरकार हो या उसके बाद की कथित ढीली नफ्ताली बेनेट सरकार सभी जवाबी सैनिक अभियान चलाते हैं। जबकि मोदी-अमित शाह-डोवाल के राज में क्या हो रहा है? हिंदू की हत्या की खबर दबाओ। हेडलाइन मैनेजमेंट करो। सवाल है इस सबसे अंत में क्या बनेगा? अपना मानना है कि इस ढर्रे के चलते अंततः दस, बीस-तीस साल बाद घाटी से जब भारत भागेगा तो अगली पीढ़ी को अनिवार्यतः याद आएगा कि मोदी-शाह ने घाटी में कैसा सत्यानाश किया था! कैसे बीज बोए थे! यह भी नामुमकिन नहीं जो घाटी से फिर पूरे देश में आग का वह सिलसिला शुरू हो, जो अमित शाह के पानीपत की तीसरी लड़ाई को साकार बना दे। सैनिक बल के बावजूद हिंदू वैसे ही इधर-उधर भागते मरते मिलें, जैसे घाटी में भागते और मरते हुए हैं।
बहरहाल, बहुत हुआ कश्मीर पर। इतना थकाने वाला विषय भारत में दूसरा नहीं है।