गणतंत्र दिवस पर विशेष
लेख: मुहम्मद सलमान आरिफ नदवी
संतकबीरनगर

कितना ही सजाले महफिल को ऐ दोस्त यह जश्ने आम नहीं।
जिस जश्न में नादारों के लिए, राहत का कोई पैग़ाम नहीं।
भारतीय इतिहास में दो ऐसी घटनाएं घटीं जिन को भुलाना मुमकिन नहीं। एक घटना सन 1857 में वाक़े हुई, जिसे गदर का नाम दिया गया। यह वाक़ेआ ऐसा था जिस ने देश को झकझोर डाला। विशेष तौर पर उस का असर मुसलमानों पर पड़ा। ऐसा प्रतीत होता था कि अब इस धरती से मुसलमानों का नामोनिशान मिटने ही वाला है। इन का अस्तित्व अब टिमटिमाते दिये की तरह है। कब हवा का कोई तेज़ झोंका आए और यह चिराग सदा के लिए बुझ जाए। पर किसी शाएर ने क्या ही खूब कहा है कि:
फूंकों से यह चराग बुझाया न जाएगा।
अभी इस देश की धरती तौहीद की ज्योति और ईमान की जगमगाहट से मज़ीद रौशन होनी थी। अभी एक नया इतिहास रचा जाना था। अभी एक नई सतर लिखी जानी थी। हुआ यूँ कि मुसलमान इस ज्वालामुखी को पार कर गया। उस के हाथ से सत्ता की कुंजी छीनी गई व् उसके मिटाने के हर मुमकिन प्रयास किए गए, उस के बावजूद न सिर्फ मुसलमानों ने स्वयं को इस भयानक सोनामी से सुरक्षित निकाल लिया, बल्कि साथ ही साथ मातृभूमि हिन्दुस्तान की डूबती नैया भी पार लगा दी। यानी:
फानूस बन के जिस की हिफाजत हवा करे।
वह शमा क्या बुझे जिसे रौशन खुदा करे।
दूसरी घटना सन 1857 ईस्वी के बाद पेश आई। यह भारतीयों और विशेष तौर से मुसलमानों के लिए प्रलय समान थी। जिस का बिगुल अंग्रेजों ने फूंका था। यह एक ऐसा तेज बहाव था जिस में सारे हिंदुस्तानियों को बह जाना था। ऐसा मालूम पड़ता था कि देश व उस की जनता अब अन्तिम पड़ाव पर हैं। अब यह कभी सिर नहीं उठा सकते। क्रूर शासकों ने अन्याय व क्रूरता के हर हथियार आजमा लिए। उन की आवाज़ दबाने के विभिन्न प्रयास कर डाले। लेकिन इतिहास गवाह है कि भारतीयों ने करवट ली, और इस सैलाब के आगे अटूट दीवार बन कर डट गए। सीनों पर गोलियां खाईं। फांसी पर चढ़ाए गए। जिन्दा जलाए गए। अंधेरी कोठरियों में बन्द किये गये। काला पानी भेजे गए। पर आजादी की लौ बुझने न पाई। स्वतंत्रता संग्राम मद्धिम न होने पाया। हिन्दू मुस्लिम सब ने कन्धे से कन्धा मिलाकर अन्यायी शासन के विरुद्ध ऐसा अभियान छेड़ा कि अंग्रेजों के दांत खट्टे हो गए। जालिम अंग्रेज सत्ता के नशे में मस्त थे। जमाने के नये हथियारों से लैस थे। पर निहत्थे भारतीयों के आगे उन का जोर टूट गया। और आख़िरकार 15 अगस्त सन 1947 को देश आजादी की किरणों से जगमगाया।
स्वतंत्र देश भारत की नींव लोकतंत्र पर रखी गई। साथ ही साथ एक कमेटी का गठन किया गया। जिस ने एक सेकुलर संविधान तय्यार किया। जिसे आज ही के दिन यानी 26 जनवरी सन 1950 को लागू किया गया।
अब हम एक स्वतंत्र और सेकुलर देश के वासी हैं। हमें विभिन्न अधिकार प्राप्त हैं। जिन्हें संविधान में उल्लेखित किया गया है। आइए हम सब मिलकर पक्का अज़्म व् इरादा करें कि भारतीय संविधान पर मुकम्मल जिम्मेदारी के साथ अमल करेंगे। और संविधान की रक्षा के लिए हर प्रकार का बलिदान देने के लिए तत्पर रहेंगे। यदि ऐसा न हुआ तो अल्लामा आमिर उस्मानी रह• की यह बातें याद रखें कि:
कितना ही सजाले महफिल को ऐ दोस्त यह जश्ने आम नहीं।
जिस जश्न में नादारों के लिए, राहत का कोई पैग़ाम नहीं।
जिस बादा की मस्ती दिल तोड़े जिस जाम से रूहें घाएल हों।
वह ताज़ा लहू है, बादा नहीं, वह कासए सर है जाम नहीं।
बरसों की मुसलसल मेहनत का इनाम तो पाया है लेकिन।
मज़दूर को जिस की ख़ाहिश थी अफसोस यह वह इनाम नहीं।
फरियाद के सदहा दुखियारे, बेघर पड़े हैं राहों में।
जाड़ों में ठिठुर गर्मी में तपिश बरसात में सक्फो बाम नहीं।
गैरों की हुकूमत थी जब भी मुफलिस के लिए आराम न था।
अपनों की हुकूमत है अब भी मुफलिस के लिए आराम नहीं।
मुहम्मद सलमान आरिफ नदवी
परसादपुर, तप्पा उजियार, संत कबीर नगर, उत्तर प्रदेश।
9792761672