जन औषधि केन्द्र को डॉ कुमार सिद्धार्थ ने बनाया सेवा का हथियार
– मरीजों को अस्पताल या भारतीय जन औषधि केन्द्र की ही लिखते हैं दवाएं
– डॉ कुमार के पास लगी रहती है मरीजों की भीड़, बढ़ रहा है लोगों का विश्वास
संतकबीरनगर, 21 दिसम्बर 2019
जितेन्द्र चौधरी


आम लोगों की पहुंच से दूर होती महंगी दवाओं का मूल्य नियन्त्रित करने के लिए जिला अस्पताल में जन औषधि केन्द्र तो खोला गया है, लेकिन प्राइवेट दवा कम्पनियों के मोहजाल में फंसे चिकित्सक इससे उबर नहीं पा रहे हैं। ऐसे में जिला अस्पताल संतकबीरनगर के फिजीशियन डॉ कुमार सिद्धार्थ ने भारतीय जन औषधि केन्द्र की इन दवाओं को मानवता की सेवा का हथियार बना लिया है।
जिला अस्पताल में बतौर फिजीशियन तैनात डॉ कुमार सिद्धार्थ के पास इस समय मरीजों की लाइन इसलिए लगती है कि वे अस्पताल में निशुल्क मिलने वाली दवाएं ही लिखते हैं, अगर कोई जरुरी दवा वहां पर नहीं होती है, तो वे भारतीय जन औषधि केन्द्र की दवाएं ही लिखते हैं। जनऔषधि केन्द्र की दवाएं पूरे मानक के आधार पर बनाई गई हैं, साथ ही विभिन्न कम्पनियों की दवाओं आधे से अधिक सस्ती होती हैं। मरीजों की लम्बी लाइनों को देखकर विभिन्न कम्पनियों के मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव भी उनके चैम्बर के आसपास मडराते रहते हैं, लेकिन उनका सीधा जवाब यही होता है कि जन औषधि केन्द्र की दवाओं के अतिरिक्त वे कोई भी दवा नहीं लिखेंगे।
क्या है भारतीय जन औषधि केन्द्र
भारतीय जन औषधि केन्द्र गरीबों की सस्ते मूल्य में जीवनरक्षक दवाएं उपलब्ध कराने के लिए भारत सरकार के द्वारा चलाई गई एक महत्वाकांक्षी परियोजना है। इसमें सरकार के द्वारा खुद तैयार कराई गई 650 प्रकार की दवाएं मिलती हैं। जिले में पहला जन औषधि केन्द्र जिला संयुक्त चिकित्सालय में अगस्त 2018 में खोला गया। लेकिन बाद में चिकित्सकों की उदासीनता के चलते यह पिछले 5 माह तक बन्द रहा। इसके बाद 28 अगस्त 2019 को बस्ती के युवा चन्द्रपाल ने एक बार पुन: इस जन औषधि केन्द्र का संचालन किया। डॉ कुमार सिद्धार्थ जैसे चिकित्सकों के सहयोग का नतीजा रहा कि यह केन्द्र बेहतर तरीके से संचलित हो रहा है। यहां पर जिला अस्पताल के साथ ही बाहर से भी लोग दवाएं लेने आते हैं। यहां की दवाएं बाहरी दवाओं से 90 प्रतिशत तक सस्ती हैं। अभी जिले में केवल 1 ही केन्द्र जिला संयुक्त चिकित्सालय में संचलित हो रहा है।
दवाओं के मूल्य में है भारी अन्तर
जन औषधि केन्द्र की दवाओ तथा बाहरी दवाओं के मूल्य में भी है अच्छा खासा अन्तर है। खांसी की ट्राइकोलीन सीट्रेट सीरप – 110 रुपए की जगह 32 रुपए, लीवर के लिए एन्जाइम सीरप 140 की जगह मात्र 40 रुपए में, दर्द की दवा ट्रामाडाल 87 रुपए की जगह 9 रुपए, दर्द व सूजन की जीरोडाल पी 49 की जगह 14 रुपए, जीरोडाल एसपी 85 की जगह 15 रुपए में मिलती है। इसके अतिरिक्त सेनेटरी पैड 10 रुपए में चार, प्रोटीन पाउडर 200 रुपए में आधा किलो, डैण्ड्रफ शैम्पू मात्र 52 रुपए में मिलता है। इसके अतिरिक्त दर्जनों ऐसी दवाएं हैं जो भारतीय जन औषधि केन्द्र पर विभिन्न कम्पनियों की दवाओं से कम मूल्य में मिलती हैं।
यह भी एक प्रकार की जनसेवा है – डॉ सिद्धार्थ
डॉ कुमार सिद्धार्थ कहते हैं कि जब मरीज काफी पीडि़त होता है तभी वह सरकारी अस्पताल में आता है, अगर उसके पास बहुत पैसा होता तो वह सरकारी अस्पताल में क्यों आता, वह भी किसी प्राइवेट अस्पताल में जाता। इसलिए ऐसे मरीजों को अस्पताल के अन्दर मिलने वाली दवाएं या वहां पर मौजूद भारतीय जन औषधि केन्द्र की ही दवा लिखता हूं। यह भी एक प्रकार की मानवता की सेवा है। जब सरकार हमें इस कार्य के लिए पर्याप्त वेतन दे रही है तो फिर हमें भी अपना काम सरकार की मंशा के अनुसार ही करना चाहिए।
मरीज भी करते हैं डॉ सिद्धार्थ की सराहना
अस्पताल में आने वाले मरीज भी डॉ सिद्धार्थ के कार्यों की सराहना करते हैं। उस्का निवासी राजेश्वरचन्द्र उर्फ राजू बताते हैं कि डॉ कुमार साहब मरीजों को काफी मन से देखते हैं, वे हमेशा या तो अस्पताल में निशुल्क मिलने वाली दवाएं लिखते हैं, या प्राइवेट दवाओं से तीन से चार गुनी कम कीमत पर मिलने वाली भारतीय जन औषधि केन्द्र की दवाएं लिखते हैं। बगहिया की संतीरा देवी बताती हैं कि हम लोगों के लिए तो डॉ साहब भगवान हैं, वह कभी नहीं चाहते हैं कि मरीजों का बिना वजह पैसा खर्च हो।