मौजूदा वक्त में रावण के पुतले यों ही विशाल नहीं हैं, इनका शृंगार, इनकी साज-सज्जा, इनके अट्टहास, भाव-भंगिमाओं-गर्जनाओं का अभिनय या साक्षात अनुभव सबसे यह सत्य निर्विवाद है कि हमें कुछ ऐसा श्राप है, जो हम और हमारा सनातनी जीवन उत्तरोत्तर रावणी होता जाना है। भले असुरों के गुलाम हो कर जीयें या स्वंय के राज का मौका मिले, सबमें जीना असुरी जीवनचर्या की नियति से है। अपने जीवन की नियति में न सत्य है, न मानवीय गरिमा और मर्यादा है। न बुद्धि है, न आधुनिकता व सदाचार हैं और न दैवीगुण के सत्कर्म हैं। vijaya dashami ravan dahan
मैं पैंसठ का हुआ! तो क्या? क्या मोल इन पैंसठ वर्षों का? अपने हिसाब से क्षणों का वह छोटा सा काल, जिस पर भले मैं जिंदगीनामा लिखूं, या कोई अपना कीर्तिनामा बनाए या अपने को कालजयी समझे अंततः तो क्षण की वह घटना है, जो हम आप सब हर विजयादशमी के दिन पलक झपकते दहन में देखते हैं। दशहरे के दिन जब रावण खाक होता है तो वह क्षणभंगुर जीवन की कहानी की सच्चाई का फोटो भी होता है। पिछले दो सालों में और खास कर 2021 में मैंने जीवन जैसे पलक झपकते खत्म होते देखे हैं तो जिंदगी को कहानी में लिखना, जग दर्शन के मेले वाले अनुभव के भी प्राण पखेरू उड़े हुए हैं। सब निस्सार! सत्य बताऊं, अब मैं बतौर सनातनी हिंदू विजयादशमी के अर्थ में विजय भाव पर फोकस नहीं बनाता हूं, न ही राम-लक्ष्मण पर फोकस होता है, बल्कि क्षण की क्षणिकाओं की ऐसी मार जो फोकस रावण और उसके कुनबे के कुम्भकर्ण व मेघनाद के पुतलों पर होता है। (शायद सबका होता होगा)! वह रावण जो अपने को कालजयी मानता था, जो झूठ का प्रतापी राजा था। जो था शिवभक्त हिंदू लेकिन अहंकार, अन्याय, अमानुषता, लोभ, मद, मत्सर अर्थात ईर्ष्या, नीचता में अमानवीय, दुखदायी व्यवहार का एक प्रतिमान राक्षस!
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पूछ सकते हैं जिंदगीनामा में यह रावण कथा क्यों? इसलिए कि पैंसठ वर्ष का मेरा क्षण मेरे पूर्वजों के सहस्त्राब्दियों पुराने सनातनी अस्तित्व का यह लघु सार बनाए हुए है कि सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलियुग के अंतहीन क्षणों के बीच मैंने जीवन के अपने क्षण में रावण जलाते-जलाते रावण बनने, बनाने का अनुभव देखा, जाना और बूझा है!
तभी पैंसठ वर्ष की जिंदगी का मेरा यह निचोड़ दो टूक है कि हमारी कभी मुक्ति नहीं है रावण से! कलियुग के भोगे पर जरा सोचें, ज्ञात इतिहास की सहस्त्राब्दियों पर गौर करें, गुलामी के हजार साल का अनुभव याद करें या आजादी बाद के 75 सालों के गांधी-मोदी के रामराज्य की क्षणिकाओं पर सोचें और विचारें तो क्या लगेगा नहीं कि हमारी विजयादशमी में राम नहीं, बल्कि रावण निरंतर भीमकाय होते गए हैं। मौजूदा वक्त में रावण के पुतले यों ही विशाल नहीं हैं, इनका शृंगार, इनकी साज-सज्जा, इनके अट्टहास, भाव-भंगिमाओं-गर्जनाओं का अभिनय या साक्षात अनुभव सबसे यह सत्य निर्विवाद है कि हमें कुछ ऐसा श्राप है, जो हम और हमारा सनातनी जीवन उत्तरोत्तर रावणी होता जाना है। भले असुरों के गुलाम हो कर जीयें या स्वंय के राज का मौका मिले, सबमें जीना असुरी जीवनचर्या की नियति से है। अपने जीवन की नियति में न सत्य है, न मानवीय गरिमा और मर्यादा है, न बुद्धि है, न आधुनिकता व सदाचार हैं और न दैवीगुण के सत्कर्म हैं।
vijaya dashami ravan dahan
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पैंसठ साल के मेरे क्षणों में दशहरा और दीपावली यों मेरी मनोदशा, मेरे जीवत्व के मनभावक क्षण, उत्सव रहे हैं। इन क्षणों में 2021, गुजरे 2020 के वर्ष, उससे पहले के साल या उससे पहले के भी साल-दर-साल से जो आंखों देखी रही है वह दिमाग को यह सोचते हुए सचमुच थका देने वाली है कि निरंतर यह किधर जाना है? हम रावण का दहन करते हुए हैं या रावण के असुरत्व में जीवन को जीते हुए उसके आतिशी प्रचार-प्रसार में रमे हुए? हम उजाले की और जाते हुए हैं या अंधकार की ओर! इतिहास की किस विजयादशमी पर सत्गुणों के शस्त्रों की पूजा से हमारे क्षण फलीभूत, सही बने?
बचपन में रामलीला और रावण दहन के दिनों में ज्यादा समझ न होते हुए भी लगता था अच्छाई और अच्छा होना कितना अच्छा! झूठ नहीं बोलना चाहिए। लोभ नहीं रखना चाहिए। घमंड नहीं करना चाहिए.. बुरा नहीं सोचना चाहिए, बैर नहीं रखना चाहिए आदि आदि। मतलब रावण नहीं बनना। हम हिंदुओं के अच्छे होने का पर्याय हैं राम।… कैसे मासूम वे क्षण और अब? ….
राम की वानर सेना कहां है? कैसी-क्या है? गुलामी के वक्त पलायनवादियों-भक्तों की सेना थी और सत्ता काल में रावण सेना में परिवर्तित? विधर्मियों की गुलामी के अनुभव को याद कर खुद ही विधर्मी याकि असुरी, रावणी होने की होड़ में हम सब। संभव है बचपन मासूम था तो सब अच्छा-अच्छा लगता था। अब जीवन का उत्तरार्ध है और दिल-दिमाग अनुभवों में पका हुआ है तो आंखों पर आग्रह, दुराग्रह की पट्टियां बंधी हुई हैं तो मुमकिन है सब अच्छा, रामराजी होते हुए भी मैं गलत समझे हुए हूं!… मुझे भी मानना चाहिए कि हमको रावण बन कर ही, आसुरी सेना जैसी ताकत बना कर विश्वगुरू की सिद्धी पानी है। हिंदुओं का तभी बचना संभव होगा जब हम भी रावण बनेंगे। तभी अपने धर्म की विजय है और विश्व गुरू की सिद्धी है! (vijaya dashami ravan dahan)
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उफ! क्या सोचूं? इसलिए वर्ष 2021 का दशहरा अपने जिंदगीनामे का वह क्षण है, जिसकी क्षणिकाओं में रावण को मैं जलता हुआ नहीं देख रहा हूं, बल्कि पूजा जाता हुआ मान रहा हूं। रावण और उसके अर्थ की तमाम बाते आज पूजनीय हैं। झूठ पूजा जा रहा है। अहंकार व परपीड़ा से परमानंद है। यहीं नहीं तमाम तरह के दुष्कर्मों अन्याय, अहंकार, लोभ, स्वार्थ, अमानुषता, बुद्धिहीनता, मूर्खताओं, झूठ, क्रोध, मद को धर्म, कौम, राष्ट्र-राज्य व नागरिक जीवन के संचालन के लिए जरूरी माना जा रहा है।
आप भला क्या मानते हैं? आप रावण का दाह करते हुए हैं या राम का? अपने राजा को क्या मानते हैं? आप न्याय होता हुआ देख रहे हैं या अन्याय? आप झूठ को पूजते हैं या सत्य को? आप अपने दुश्मन (इस्लाम, पाकिस्तान या प्रतिद्वंद्वी, या जीवन अनुभव में आए नीच राक्षस या पिशाची वृत्ति के मनुष्यों) का सामना मर्यादा पुरूष राम की तरह करेंगे या रावण बन कर करेंगे? क्या हम सनातनी लोग रावण हो कर, राक्षस सेना बन कर विधर्मियों को हरा सकते हैं या हमेशा के लिए खत्म होंगे?
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सोच सकते हैं, पैंसठ साल के होने के क्षण में मेरा दिमाग क्या-क्या सोचते हुए है! उस नाते जीवन का अपना उत्तरार्ध सचमुच इतनी घटनाओं, आपदाओं, विपदाओं और विवशताओं से भरा हुआ है कि लिखने के ओर-छोर में भटकना ही भटकना है। आखिर जब राम सेना ही रावण सेना दिखे और रावण के पुतले अवतारी, कल्कि अवतार माने जाएं, सोने की लंका के गौरव में लोग अपने को विश्वगुरू हुआ मानें तो सोचें मेरी पैंसठ साल की उम्र का केक कैसा होगा!