पर सारी गलतियां सरकार की ही नहीं हैं। कश्मीर का कोई समाधान नहीं है क्योंकि कश्मीरी मुसलमान, घाटी के प्रमुख और जो भी असरकारक हैं वे मुसलमान समाधान नहीं चाहते हैं। कश्मीरी मुसलमानों के आलेख पढ़िए, ट्वीट्स देखिए, उन्हें बोलते हुए सुनिए। उनकी शब्दावली वही है। मतलब हत्यारों को ‘अनजाने बंदूकधारी’, ‘संदिग्ध आतंकवादी’, बताना। ये आज भी सच बोलने को तैयार नहीं हैं, जानबूझकर इस बात को नजरअंदाज करते हैं, पूरी तरह नजरअंदाज करते हैं कि जड कारण चरमपंथी इस्लामी आतंकवाद है। civilian killings in kashmir
कश्मीर कभी भी ‘नया’ नहीं हो सकता है। ‘न्यू इंडिया’ की संभावना तो हो सकती है लेकिन ‘नया कश्मीर’ संभव नहीं है। जान लीजिए, मान लीजिए।
Read also न्यू इंडियाः कहां, कैसा, क्या?
‘अंकल बिन्द्रू की हत्या हो गई है।‘ यह वाक्य कश्मीरी हिन्दू समुदाय ने अविश्वास, गुस्से …. और डर में कहा। एक झटके में, नवरात्र की शुरुआत से सिर्फ दो दिन पहले और जोरदार धमाके की तरह लोगों सुन्न कर गया है, मूड न केवल भुतहा और निराशाजानक हो गया बल्कि, भयावह तौर पर उस ‘न्यू कश्मीर’ के लिए खतरनाक जिसका उपयोग लगातार अर्से से झुनझुने की तरह किया जा रहा है।
‘न्यू कश्मीर’ के संभावी जुमले में घाटी में कई मौतें हो चुकी हैं और मरने वाले ज्यादातर हिन्दू हैं। श्रीनगर के मशहूर कृष्णा ढाबा के मालिक के बेटे आकाश मेहरा, 65 साल के जौहरी सतपाल निश्चल अधिवास, डोमिसाइल प्रमाणपत्र बनवाने के जिक्र में मार डाले गए। जम्मू कश्मीर के पुलिस वाले बंटू जी शर्मा कुलगाम के अपने घर लौटने पर मार डाले गए। ऐसे ही भाजपा कार्यकर्ता, नेता, पुलिसवाले (सब कश्मीरी हिन्दू) चेहरे भी बर्बरता से मार डाले गए। और एक दिन 5 अक्तूबर को दिन दहाड़े, श्रीनगर में सामान्य हलचलों के वक्त में अचानक वह धमाका हुआ जिसका मैसेज दो टूक लाल बत्ती वाला!
श्रीनगर में माखन लाल बिंद्रू का अर्थ था, 1990 का दहशत झेल चुके, प्रमुख कारोबारी, फार्मासिस्ट। शहर में बचे चंद नामी कश्मीरी पंडितों में एक। उनका परिवार उस मुश्किल समय में रहा, बढ़ा और फला-फूला जब घाटी में लोग कांपते थे। बेटी की हाल में शादी हुई थी और बेटा कारोबार में पिता की सहायता करने के लिए वापस आया था। बिन्द्रू परिवार मुट्ठी भर हिन्दू परिवारों के लिए जिन्दा रहने की याद दिलाने का प्रतीक था। ये वो लोग थे जो घाटी में जिन्दा बने रहने की हिम्मत रखते थे। जिन्होने आंतक के हर मोड का हिम्मत से सामना किया। लेकिन पांच अक्तूबर को जब दिन ढल चुका था तभी 70 साल के माखन लाल बिन्द्रू का अंत आया और इसके साथ ही कई परिवारों की हिम्मत जवाब दे गई। फिर क्या था?..सोशल मीडिया पर नाराजगी घाटी में रहने वाले अल्पसंख्कों की आवाज मानो बंद या बहुत ही हल्की। मौत की अनिश्चितता एक बार फिर कश्मीर की हवा को भारी, बेजान बनाए हुए।
पांच अक्तूबर का आतंकवाद वहीं खत्म नहीं हुआ। श्री बिन्द्रू की मौत के कुछ ही सेकेंड बाद एक और हिन्दू को गोली मार दिए जाने की खबर थी। भागलपुर, बिहार के पवन कुमार को इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि उन्होंने श्रीनगर की किसी सड़क पर गोलगप्पे बेचने का कारोबार करने वाले ‘बाहरी’ होने की हिम्मत दिखाई थी। उन्हें एक व्यस्त सड़क पर निर्ममता से गोली मार दी गई थी। बेपरवाह, कारें गुजर रही थीं, लोग पटरियों पर चल रहे थे और वह बेगानी घाटी के एक फुटपाथ पर मरा पडा था।…ऐसे ही दो दिन बाद एक स्कूल में सिख महिला प्रिंसिपल और एक हिंदू अध्यापक आंतकी गोलियों से ..
civilian killings in kashmir
Read also कश्मीर का ‘नया’ होना क्या?
कश्मीर में मूड हमेशा खींचता, जस का तस रहा है। मोदी और शाह के न्यू कश्मीर में हिन्दू समाज के लोगों का डर लगातार बना रहा है। एक बिहारी मजदूर को निशाना बनाने से डर का मनोविज्ञान अब देश भर में फैलेगा। बिहार के लोग अकेले थे जिन्होंने कश्मीर आने (गोलगप्पे बेचने जैसे छोटे-छोटे काम) की हिम्मत दिखाई थी, आधार तलाशा था और अपने काम से संतुष्ट थे। उनका जीवन, उनकी आय और इन सबके ऊपर, निडर बने रहना महत्वपूर्ण संदेश देता हुआ था।
कश्मीर घाटी की अपनी हाल की यात्रा के दौरान मैंने लाल चौक से लेकर पहलगाम तक कई भेलपुरी वालों, गोलगप्पा बेचने वालों से बात की और सबने विश्वास से कहा था, ‘हमको कौन मारेगा’। लेकिन अब, पहली बार उन्हें चिन्ता की छाया ने घेर लिया होगा। असहज होकर जीना और रोजी रोटी कमाते हुए कांपते हुए रहना।…. निश्चित ही जो गए है उन्हे घर से परेशान करने वाली फोन कॉल, ‘घर वापस आ जाओ’ और यहां ऐसे ही संदेश, ‘किसी बाहरी का स्वागत नहीं है, जाओ या मरो’ की बाते भी सुननी पड रही होगी। ।
कश्मीर कभी ‘न्यू’ नहीं बन सकता है। अनुच्छेद 370 को खत्म किया जाना एक निर्भीक कदम था लेकिन इसके बाद जो हुआ उसकी ना तो पहले चर्चा हुई और ना ही अब हो रही है। सड़कों पर तिरंगा लगाना या हरिपर्वत के ऊपर आठ फीट का तिरंगा लहराना न्यू कश्मीर नहीं है और निश्चित रूप से इससे कश्मीर को लेकर सोच या समझ नहीं बदलेगी। न ही डल झील की पृष्ठभूमि में ‘आई लव श्रीनगर’ के साथ घूमते हुए पर्यटकों की तस्वीर खिंचवाना न्यू कश्मीर नहीं है बल्कि एक औपचारिकता भर है जो यह नहीं बताता है कि कश्मीर घाटी में, ‘ऑल ईज वेल’ है।
तभी वक्त है जो इस सत्य का सामना करें कि कश्मीर अब बेहद अतिवादी है और बदलाव के लिहाज से बह बेहद इस्लामिक है।
और यह कहना भर पर्याप्त नहीं है कि कश्मीरी पंडित अगर घाटी में वापस नहीं जाना चाहते हैं, अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने के बाद भी इसके लिए तैयार नहीं हैं तो इसका कारण एक ही है और वह है सुरक्षा की भावना का अनुपस्थिति होना। कश्मीर में मौजूद हिन्दू परिवारों के लिए सुरक्षा लापता है। पंडितों की पूरी आबादी को बसाना, उनका पुनर्वास कभी भी वहा संभव नहीं होगा। मुमकिन है, ऐसा इरादा भी न हो।
civilian killings in kashmir
Read also जितिन प्रसाद प्रसंग : ‘राजनीति आज’ का सत्य
कश्मीर अब भी वही है जो अलगाववादियों ने बनाया है और पाकिस्तान इसकी आबोहवा का संरक्षक है। एसएसपी, आईजी, कमिश्नर, राज्यपाल बना कर घाटी में लाए गए खांटी नेता सब डूबते जहाज के साथ डूब रहे हैं। वह आवश्यक परिवर्तन लाने में नाकाम हैं जिसकी कल्पना की गई थी और अनुच्छेद 370 खत्म करने के बाद जो सोचा गया था। श्री बिन्द्रू (और उनके साथ कुछ अन्य प्रमुख हिन्दू कारोबारी परिवारों) की हत्या का अंदेशा हफ्तों से था और महीनों से इस बात की खुफिया जानकारी थी कि घाटी के अल्पसंख्यक बेहद खतरे में हैं। यह आंशका है कि तकरीबन 100 हिन्दू परिवारों को चिंहित किया हुआ है और ये आतंकवादियों की हिट लिस्ट में हैं।
पर सारी गलतियां सरकार की ही नहीं हैं। कश्मीर का कोई समाधान नहीं है क्योंकि कश्मीरी मुसलमान, घाटी के प्रमुख और जो भी असरकारक हैं वे मुसलमान समाधान नहीं चाहते हैं। कश्मीरी मुसलमानों के आलेख पढ़िए, ट्वीट्स देखिए, उन्हें बोलते हुए सुनिए। उनकी शब्दावली वही है। मतलब हत्यारों को ‘अनजाने बंदूकधारी’, ‘संदिग्ध आतंकवादी’, बताना। ये आज भी सच बोलने को तैयार नहीं हैं, जानबूझकर इस बात को नजरअंदाज करते हैं, पूरी तरह नजरअंदाज करते हैं कि जड कारण चरमपंथी इस्लामी आतंकवाद है।
ऐसी नहीं है कि वहा सबके सब आतंकवादी हैं। ना ही घाटी के सभी मुस्लिम चाहते हैं कि हिन्दुओं को बाहर कर दिया जाए। पर मेरा उनसे सवाल है – आप चीखते, चिल्लाते और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शोर मचाते रहे हैं कि भारत हाल के समय में अल्पसंख्यकों के लिए मुश्किल जगह हो गई है पर क्या कश्मीर हमेशा से ऐसी ही जगह नहीं रही है जहां अल्पसंख्यकों का लगभग नरसंहार किया जा रहा है, बेखटके हत्या कर दी जाती है और उन्हें अपना घर जमीन छोड़ने को मजबूत किया जाता है।
Read also ब्लू टिक… वक्त को खाता नया नशा!
हल्ला क्या और हकीकत?
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। हम सब भाई-बहन हैं। जब आपका कोई अपना मारा जाता है तो हम एकजुटता में आपके साथ खड़े होते हैं। लेकिन जब कोई हिन्दू, कश्मीरी हिन्दू घाटी में बार-बार मारा जाता है तो यही एकजुटता कहां चली जाती है?
घृणा, गुस्सा और हकीकत?
हाल के समय में भारत ‘हिन्दुत्व’ की ओर बढ़ रहा है। हिन्दू पर फासीवादी, नात्सीवाद का लेबल लगा रहे हैं पर शोर कहां है, वह विरोध कहां है जो कश्मीर के लिए कहा जाता है। इस्लामिक आतंकवाद में कश्मीर जो हो चुका है उसका विरोध क्यों नहीं है? ऐसे मौकों पर आप छिप क्यों जाते हैं?
तय माने कश्मीर की सड़कें खून से लाल होती रहेंगी। मूड हमेशा तनावभरा रहेगा। आज वहां शोर नहीं होगा कल कश्मीरियत की बात होगी और महीने भर बाद हम फिर उसी सवाल पर पहुंच जाएंगे जब हिन्दू की हत्या किसी आतंकवादी द्वारा कर दी जाएगी। क्या कभी न्यू कश्मीर होगा? सरकार न्यू कश्मीर बनाने में भले नाकाम रहे लेकिन आतंकवादी, अतिवादी घाटी में हरहने वाले प्रत्येक हिन्दू में डर का मनोविज्ञान तैयार करने में कामयाब हैं। इसलिए बुरे दिन तो आने ही आने है।