जी हां, ‘न्यू इंडिया’ का सत्य, अप्रिय तथ्य इस एक लाइन में सिमटा हुआ है कि ‘उनमें ध्रुवीकरण, सख्त और मारक है’। ‘न्यू इंडिया’ की नई नौजवान पीढ़ी पूरी तरह से ध्रुवीकृत सामाजिक मीडिया और फर्जी खबरों की दुनिया के नशे में अपादमस्तक डूबी हुई है; नई पीढ़ी को नौकरी और शिक्षा की बजाय तात्कालिक नशे की लत में, झूठ में जीना पसंद है। भारत की नई पीढ़ी कल के खतरों को नहीं देख सकती, उसे यह यकीन दिला दिया गया है कि उसके ठीक अगले दरवाजे पर रहने वाले दुश्मन से बचाने वाले अकेले योगी व मोदी हैं। (New India UP election)
पते की यहीं नंबर एक बात! यह वह शीर्षक/विषय है, जिस पर हर भारतीय को सोचना जरूरी है; हर व्यक्ति को विचार करना है, बूझना है, जानना है कि कैसा ‘न्यू इंडिया’? कई बुद्धिमान, समझदार परेशान दिखते हैं तो सही अर्थों के सच्चे देशभक्त भी अपने इर्द-गिर्द देख हैरान हैं, चकराए हुए हैं कि देश को जैसा समझे हुए थे वैसा अब नहीं रहा। जो समझा-सोचा हुआ था उसे अब पहचान नहीं पा रहे हैं। कुछ कनेक्ट नहीं कर पाते। ‘न्यू इंडिया’ का निर्माण, सात साल पहले जो एक अच्छा ख्याल लगा था, उसकी याद झनझनाहट बनाती है, दुख होता है कि क्या ऐसा ही ‘न्यू इंडिया’ होना था!
देश ठहरा सा, बीमार याकि डिसफंक्शनल और विभाजकता की अवस्थाएं व प्रवृत्तियां लिए हुए है। और यह किसी एक व्यक्ति के चिन्तन अथवा उसकी गैर-जिम्मेदारी से नहीं हुआ है, बल्कि मोटे तौर पर इसका कारण अज्ञानी और अनपढ़ समाज की अयोग्यताओं से है जो हमेशा से थी लेकिन अब तेज रफ्तार बढ़ती हुई है। यह रफ्तार ही क्या ‘न्यू इंडिया’ की पहचान नहीं?
बुनियादी सवाल है कैसा बना है ‘न्यू इंडिया’ जिसका इतनी बेशर्मी से प्रचार है?
हाल में मैं लखनऊ में थी ताकि शहर के राजनीतिक माहौल का अंदाजा लगे, राजनीतिक दलों का मूड जान देश के सबसे बड़े प्रदेश के हालातों से ‘न्यू इंडिया’ को समझ सकूं। देश के सबसे बड़े राज्य की राजधानी बेशक तैयार है चुनाव के लिए। चुनाव पूर्व प्रचार की भिन्न किस्मों से सजी हुई। कोने-कोने पर असामान्य रूप से बड़े आकार के पोस्टर लगे हैं उन मैसेज के साथ जो आम आदमी की आंखों और दिमाग से तुरंत जुड़े। मोदी और योगी के मुस्कुराते चेहरों के साथ ‘मुफ्त राशन’, ‘मुफ्त वैक्सीन’ जैसे पोस्टर सभी तरफ लगे हैं। मुफ्त, हर चीज मुफ्त। इसका मकसद राज्य की जनता के दिमाग में वांछित बीज डाल देना है- लड़की हो, लड़का हो या पुरूष या महिला अथवा बुजुर्ग… सबको मुफ्त, मुफ्त, मुफ्त। बेशक शहर के पोस्टर वॉर में योगी-मोदी सरकार आगे चल रही है, हवा उनके पक्ष में है।
तो क्या मुफ्त, मुफ्त के मैसेज में बनता, ढलता-खिलता ‘न्यू इंडिया’!
ऐसे में राज्य के अन्य बड़े राजनीतिक दिग्गजों को अस्तित्व भला कहां होगा? केवल इनके अपने पार्टी दफ्तरों में। अन्यथा सब अस्तित्वहीन से, व्यावहारिक अर्थ में।
मायावती का मॉल एवेन्यू लगभग सन्नाटे में। किसी भी अन्य राजनीतिक कार्यालय से अलग (खराब समय की कांग्रेस से भी बदतर) वहां शांति और सन्नाटा है। राज्य के पत्रकारों की राय है, ‘बसपा चुनाव मैदान में नहीं’ है। जाहिर है, दफ्तर में हैरान करने वाली वीरानी, शोर व जोश कुछ भी न होने का अहसास समझ से परे की बात है। दफ्तर में सन्नाटे और पार्टी सुप्रीमो की सामान्य चुप्पी से लगता है मानो पार्टी खेल मैदान से बाहर है। ऐसे ही प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी के दफ्तर का दृश्य भी खास अलग नहीं है। उनके युवा नेता, पार्टी के वयोवृद्ध नेता अपने भारी राजनीतिक कौशल के अनुभवों के बावजूद शांत, ठहरे से हुए। शहर के पुराने पत्रकारों से सुनने को मिला कि ‘वे’ डर में जी रहे हैं। लोगों का कहना है कि वे बाहर आने, चुनाव प्रचार करने, लोगों से बातचीत करने, बयान देने, लोगों को सूचना देने और सत्ता के वक्त जैसी सरगर्म स्थिति में आना तो चाहते हैं लेकिन डर लगातार और स्थिर है। ऐसे में कार्यालय की ओर जाने वाली विक्रमादित्य रोड किसी सामान्य सड़क की ही तरह है। हलचल के बावजूद बेजान सी!
Read also गांधी के प्रति विकलांग श्रद्धा
तो मूड क्या है? राजनीतिक रूप से निष्क्रिय लेकिन बातों की बहुलता के साथ। बातें ही बातें। हवा में जुमले खूब हैं जैसे ‘ब्राह्मण गुस्से में हैं’, ‘लोग नाखुश हैं’, ‘मध्यमवर्गीय परिवार दुखी हैं’, ‘मोटर साइकिल सवार नौजवान पेट्रोल खर्च से खदबदाए हुए हैं’। ‘महिलाएं महंगाई से नाराज हैं’, ‘किसान खुन्नस में हैं’, ‘दलित गुस्से में भरे हैं’, ‘ओबीसी भटक रहे है’ और… ‘मुसलमान शांति से सब देख रहे हैं… इंतजार कर रहे है’।
बातें हैं, जुमले हैं। सर्वत्र सुनने को मिलेगा; चारों तरफ गुस्सा है, असंतोष, हताशा, निराशा, मोहभंग है लेकिन अंतिम लाइन के साथ मूड एकदम मुड़ जाता है! मोदी सरकार की शुरुआत के बाद से अब तक मूड हर मोड़ पर हर जगह घटता हुआ होते हुए भी आखिर में मूड पक्का, कठोर हो जाता है इस कीड़े पर कि विकल्प क्या है! तभी अंत में आम सहमति से सुनने को मिला- ब्राह्मण अंततः शांत हो जाएंगे, लोग जैसे-तैसे गुजरते जीवन से भी संतुष्ट रहेंगे। किसानों का गुस्से में रहना भले जारी रहे लेकिन उन्हें भी मुफ्त और खाते के पैसे याद रहेंगे, मध्यमवर्गीय परिवार बुरे समय और किस्मत के रोने के बावजूद यह सोचते हुए शांत रहेंगे कि कुछ भी हो योगी-मोदी सरकार ने ‘उन लोगों’ को तो ‘नियंत्रण में’ रखा हुआ है, ‘उस समुदाय को हैसियत बताई हुई है’।
लेकिन ये बातें ‘न्यू इंडिया’ की हवा में फिर भी अधिक मायने वाली नहीं। इन सबसे बड़ी मुसीबत नई ब्रीड, नई पौध का एकदम अलग तरह से पका होना है।
भारत की 140 करोड़ लोगों की आबादी में नई पौध का अर्थ वह युवा पीढ़ी, 20 से 40 वर्ष की उम्र के वे लोग हैं, जिनसे बात करना सबसे मुश्किल है। ‘उन्हें तर्क से यकीन दिलाना थकाऊ और परेशान करने वाला काम है’। यह बात मुझे एक ऐसे नेता ने कही जो एक पार्टी के मंजे हुए राजनेता हैं और जो युवाओं पर ही अधिक फोकस बनाए हुए हैं। जो आम आदमी के सच पर राजनीति करते हुए हैं।
‘ऐसा क्यों’?
‘उनका ब्रेनवॉश किया जा चुका है। वे मुसलमानों को अपने अकेले दुश्मन के रूप में देखते हैं। उनमें, उनके भीतर ध्रुवीकरण बहुत सख्त और मारक है।
जी हां, ‘न्यू इंडिया’ का यह सत्य, अप्रिय तथ्य इस एक लाइन में सिमटा हुआ है कि ‘उनमें ध्रुवीकरण, सख्त और मारक है’। (Polarization in them, within them is hard and hitting)। न्यू इंडिया की नई पीढ़ी पूरी तरह से ध्रुवीकृत सामाजिक मीडिया और फर्जी खबरों की दुनिया के नशे में अपादमस्तक डूबी हुई है; नई पीढ़ी को नौकरी और शिक्षा की बजाय तात्कालिक नशे की लत में, झूठ में जीना पसंद है। भारत की नई पीढ़ी कल के खतरों को नहीं देख सकती, उसे यह यकीन दिला दिया गया है कि उसके ठीक अगले दरवाजे पर रहने वाले दुश्मन से बचाने वाले अकेले योगी व मोदी हैं। वे आज के उग्र विचारों से इस विश्वास में, भूख और बदले में जीते हुए हैं कि इससे ही कल उनके लिए ‘न्यू इंडिया’ संभव होगा। एक वह काल्पनिक ‘न्यू इंडिया’, जिससे देश के भीतर विभाजन और घृणा जायज है और भयाकुलता, बेचैनी और क्रूरता में नई दुनिया बननी है।
इस नई पौध और उसके ख्यालों के ‘न्यू इंडिया’ में बेरोजगारी, अमीर-गरीब असमानता, विनिवेश, महामारी जैसी बातों का मतलब नहीं के बराबर है।
तभी जब कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवाणी कुछ और युवाओं के साथ 29 सितंबर को कांग्रेस में शामिल हुए तो ‘न्यू इंडिया’ में खेल की सबसे पुरानी पार्टी की बेचैनी झलकी। इसे, नौजवानों की नब्ज सुनने में लगातार असफल हो रही पार्टी की समझदार कोशिश मानें या आत्मघाती कोशिश? क्या कन्हैया या जिग्नेश उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार करके, लखनऊ में नए पेंट किए गए और सजाए गए कांग्रेस कार्यालय में बैठकें करें तो उससे कांग्रेस को अन्य दलों के साथ गठजोड़ में मदद मिलेगी, युवाओं को साथ लिया जा सकेगा या उलटे सब छिटकेंगे?
क्या देश की सबसे पुरानी पार्टी जिग्नेश-हार्दिक पटेल की अपनी ब्रीड से ‘न्यू इंडिया’ के ‘गुजरात मॉडल’ को गुजरात में मिटवा सकती है जो बिहार, उत्तर प्रदेश में वह उम्मीद करे?
फिलहाल तो नहीं क्योंकि कथित ‘न्यू इंडिया’ एक बड़े कैनवास पर ‘गुजरात मॉडल’ की पेंटिंग है।
उत्तर प्रदेश का अगला चुनाव 2024 के आम चुनावों का सेमीफाइनल हो सकता है, जो तख्त ए दिल्ली के भविष्य का टीज़र होगा। मगर लगता है उत्तर प्रदेश का चुनाव युवाओं के दिल-दिमाग में धुव्रीकृत ‘न्यू इंडिया के विचार को सीमेंटेड करेगा। इसलिए, जो ऐसा नहीं चाहते हैं उन सभी लोगों को, सच्चे देशभक्तों, सेकुलरों, समझदारों को मतभेद भुलाकर पहले तो योगी और मोदी व उनकी राजनीति पर गला फाड़ शोर बंद करना चाहिए क्योंकि इससे उलटे ‘न्यू इंडिया’ का आइडिया और मजबूत बनता हैं। ये सर्वप्रथम समझें नए युवा की समझ को, उसके मुसलमानों के प्रति नजरिए को। उसे समझ कर समझाएं, उन्हें शांत करें, उनको सोचने की उसी के अंदाज में जानकारी दें, उन्हें मोल्ड करें, उनको अपने नैरेटिव में ढालें, उन्हें आश्वस्त करें कि एक विकल्प है, जो सही अर्थों में वह ‘न्यू इंडिया’ बना सकता है जो बिना विभाजन, कलह, नफरत के होगा। नहीं तो वह वक्त दूर नहीं जब सभी हाथ झूठ, घातक अराजकता और भय में भारत को लाल रंग में रंगते हुए गंदे बनेंगे।