महात्मा गांधी के प्रति हम भारतीयों की विकलांग श्रद्धा का दौर उनके जीवन काल में ही शुरू हो गया था। दुर्भाग्य से श्रद्धा की उस विकलांगता को दिव्यांगता में बदलने का कोई प्रयास भारत में नहीं किया गया, जिसका नतीजा यह हुआ कि दुनिया भर में गांधी के प्रति श्रद्धा बढ़ती गई और भारत में उनके प्रति श्रद्धा पहले से ज्यादा विकलांग होती गई। हर साल दो अक्टूबर को प्रधानमंत्री और प्रतिपक्ष के नेता से लेकर तमाम बड़े नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री गांधी की समाधि या उनकी मूर्ति के सामने जाकर माथा टेकते हैं और गांधी के प्रति हर किस्म की श्रद्धा का श्राद्ध वहीं करके घर लौट आते हैं। जो सचमुच श्रद्धा और सम्मान रखते हैं उनको भी इस बात की चिंता नहीं होती है कि कैसे सुनियोजित तरीके से गांधी विचार को मारने का प्रयास हो रहा है। nathuram godse gandhi jayanti
यह कहना भर पर्याप्त नहीं है कि गांधी शरीर नहीं, विचार का नाम है और 30 जनवरी 1948 को गांधी का सिर्फ शरीर मरा था, उनके विचार अमर हैं। किसी भी विचार की अमरता उससे अनुपालन से सुनिश्चित होती है। खासतौर से ऐसे विचार, जिनको लगातार चुनौती मिल रही हो और सुनियोजित तरीके से उस विचार के बरक्स बिल्कुल विपरीत विचार को सत्ता के संरक्षण में फलने-फूलने का मौका मिल रहा हो।
भारत में गांधी विचार के विरोध में एक हिंसक प्रतिविचार दशकों से पनप रहा है, जिसे मौजूदा शासन व्यवस्था में फलने-फूलने का अवसर मिला है। यह अनायास नहीं है कि पिछले दो-तीन साल से हर साल दो अक्टूबर को गांधी जयंती के मौके पर ट्विटर पर ‘गोडसे जिंदाबाद’ के नारे को ट्रेंड कराया जाता है। यह भी अनायास नहीं है कि देश के कई हिस्सों में सत्तारूढ़ दल या उससे जुड़े वैचारिक संगठनों के लोगों द्वारा गोडसे की मूर्तियां लगाई जाने लगी हैं। यह भी अनायास नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी की सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को राष्ट्र भक्त बताया और पार्टी के सर्वोच्च नेता यानी प्रधानमंत्री ने सिर्फ इतना भर कहा कि वे उन्हें कभी भी दिल से माफ नहीं करेंगे। यह भी अनायास नहीं है कि अचानक हिंदी सिनेमा के लोगों को गोडसे के जीवन पर फिल्म बनाने की प्रेरणा मिल गई। महात्मा गांधी की 151वीं जयंती के मौके पर दो फिल्मकारों ने गोडसे के ऊपर फिल्म का ऐलान किया, जिसे मराठी के जाने-माने अभिनेता और निर्देशक महेश मांजेरकर निर्देशित करेंगे। यह कितनी भयावह और चिंताजनक बात है कि गोडसे के ऊपर फिल्म बनाने वाले लोग कह रहे हैं कि देश के लोगों में गोडसे के बारे में जानने की रूचि है।
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सोचें, जरा इस दुर्भाग्य पर दुनिया गांधी को जानने-समझने और अपनाने का प्रयास कर रही है और भारत में लोगों की गोडसे को जानने में रूचि पैदा हो रही है! ऐसा कैसे हो रहा है? पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ कि ‘गोडसे जिंदाबाद’ ट्विटर पर ट्रेंड हो, गोडसे की मूर्ति लगे, गोडसे देशभक्त बताया जाए और उसके ऊपर फिल्म बने! फिर अब क्या बदल गया है, जो यह सब कुछ होने लगा है? ऐसा कैसे हो गया कि हम भारत के लोग गांधी, उनके विचार और दर्शन के प्रति अपनी श्रद्धा को शर्तों में लपेटने लगे और उनके हत्यारे का भी महिमामंडन शुरू कर दिया? आज हर जगह लोग कहते मिलेंगे कि गांधी महान थे लेकिन… या गोडसे ने गांधी को मारा लेकिन…! इस लेकिन के आगे क्या? इस लेकिन के आगे सब कुछ धूसर सा है, जिसमें अपने अपने हिसाब से रंग भरे जा रहे हैं।
आजादी की लड़ाई में गांधी के योगदान और उनके महत्व को व्यवस्थित और सुनियोजित तरीके से कमतर किया जा रहा है। साबरमती के संत का मजाक बनाया जा रहा है। गांधी के मुकाबले सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह के योगदान को ज्यादा बताया जा रहा है। जो दुष्प्रचार पहले जवाहर लाल नेहरू को लेकर किया गया, उसका विस्तार अब महात्मा गांधी तक हो गया है। जिन लोगों ने आजादी की लड़ाई में कभी हिस्सा नहीं लिया वे बता रहे हैं कि साबरमती के संत ने कोई कमाल नहीं किया, बल्कि आजादी सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद की कुर्बानियों से मिलीं। सोचें, न सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह उनके हैं और न गांधी, नेहरू उनके हैं। लेकिन उन्हें इससे कोई मतलब नहीं है। उनको सिर्फ इतिहास को दूषित करना है ताकि समाज को दूषित और बीमार बनाने के अभियान में कामयाबी मिले।
असल में देश में चलाई जा रही विभाजनकारी राजनीति की सफलता के लिए जरूरी है कि गांधी विचार को समाप्त किया जाए। गांधी विचार के जीवित रहते नफरत और विभाजन की राजनीति सफल नहीं हो सकती। तभी योजनाबद्ध तरीके से समाज में झूठ, हिंसा और नफरत के बीज डाले जा रहे हैं। हालांकि बीज डालने वालों को पता है कि गांधी विचार के जीवित रहते इसकी फसल नहीं लहलहा सकती है। तभी गांधी को अपमानित करने का अभियान चल रहा है। बिल्कुल झूठे सबूत गढ़ कर उनको मुस्लिम और पाकिस्तानपरस्त साबित किया जा रहा है। बरसों से यह झूठ स्थापित किया जा रहा है कि गांधी की वजह से नेताजी सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस और देश छोड़ कर गए या गांधी चाहते तो भगत सिंह की फांसी टल सकती थी। यह सही है कि गांधी ने पटेल की जगह नेहरू को आजाद भारत का पहला प्रधानमंत्री बनवाया लेकिन उसके ऐतिहासिक कारण थे और इसलिए पटेल ने कभी इसकी शिकायत नहीं की।
इसमें किसी को आपत्ति नहीं हो सकती है कि कोई नेता, प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री नेहरू की जगह सरदार पटेल को ज्यादा बड़ा नेता माने और उन्हें तरजीह दे। लेकिन कम से कम गांधी के मामले में तो सरकार पटेल के विचारों का सम्मान करे। गांधी के प्रति सरदार की श्रद्धा और निष्ठा अटूट और बिना शर्त थी। इसलिए सरदार को मानने वालों से इतनी तो उम्मीद की जा सकती है कि वे उन्हीं की तरह गांधी के प्रति अटूट श्रद्धा और निष्ठा रखेंगे। लेकिन अफसोस की बात है कि नेहरू की मूर्ति से सिंदूर खरोंचने के लिए सरदार की ऊंची मूर्ति बनाई जा रही है और नेहरू के मूर्तिभंजन के साथ साथ गांधी विचार का भी विसर्जन किया जा रहा है। नेहरू को खलनायक बनाने में काफी हद तक सफल हो चुके प्रयोग के बाद अब गांधी को विलेन बनाने का प्रयास चल रहा है। गोडसे को नायक बनाना इसी प्रयास का हिस्सा है।
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दो अक्टूबर को ट्विटर के ऊपर दो लाख से ज्यादा ट्विट ‘गोडसे जिंदाबाद’ के थे। कुछ लोगों ने जब इसका विरोध किया तो छद्म वेशधारी कई गांधीवादी सामने आकर कहने लगे कि गांधी होते तो वे इस विचार का भी सम्मान करते और ‘गोडसे जिंदाबाद’ कहने वालों को भी अपनी बात कहने देते। एक ‘महान’ संपादक ने तो गांधी विचार की नसीहत देते हुए गोडसे समर्थकों से भी संवाद का सुझाव दे डाला और कहा कि गांधी के सामने ही उन्हें धमकियां और गालियां देने वाले लोग थे। सोचें, यह कैसा भोलापन है कि संपादक महोदय को गांधी की आलोचना और गोडसे की तारीफ का फर्क नहीं समझ में आ रहा है। इसके आगे कुतर्क यह कि किसी के जिंदाबाद का नारा लगाना गैरकानूनी नहीं है। कुछ बातें कानून के दायरे से परे होती हैं और उसके सही या गलत होने का फैसला देश, समाज और नागरिकों की सामूहिक चेतना से होता है। अगर देश की सामूहिक चेतना ऐसी बन रही है कि ‘गोडसे जिंदाबाद’ कहना गैरकानूनी नहीं है इसलिए ऐसा कहने की अनुमति होनी चाहिए तो यह इस देश के गंभीर रूप से बीमार होने का प्रमाण है!
अंत में सरकार की जिम्मेदारी का सवाल है। गांधी जयंती के दिन जब ‘गोडसे जिंदाबाद’ ट्रेंड हो रहा था और सोशल मीडिया में गांधी के खिलाफ उल-जुलूल पोस्ट वायरल हो रहे थे तब देश के आईटी मंत्री को यह नहीं सूझा कि वे ट्विटर को चेतावनी दें कि वह इसे रोके! नए नियमों के पालन के लिए इसी सरकार ने ट्विटर को घुटनों पर ला दिया था। लेकिन उसी सरकार को सुध नहीं है कि वह देश को शर्मसार करने वाले ट्विटर ट्रेंड पर रोक लगवाए! सरकार चाहती तो न सिर्फ इस ट्रेंड को रूकवाती, बल्कि इसे ट्रेंड कराने वालों की पहचान करके उन पर सख्त कार्रवाई करती ताकि नजीर बने। याद रखें, जो चुप हैं, तटस्थ हैं वे इस दुष्कृत्य में शामिल माने जाएंगे! क्षमा करना बापू, यह कृतघ्न लोगों का देश है! nathuram godse gandhi jayanti