इससे जाहिर होता है कि ग्रामीण इलाकों में चिकित्सा व्यवस्था का क्या हाल है। और वहां के लोगों की सेहत की सरकारों को कितनी चिंता है। समस्या यह है कि जब देश में आम इनसान से सीधे जुड़े मुद्दे मीडिया विमर्श और राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में ना हों, तो लोगों की जान इसी तरह सस्ती बनी रहती है (viral fever children death)
बिहार से खबर है कि वह पिछले एक महीने में बुखार की चपेट में आकर 25 से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है। कई बच्चों का गंभीर अवस्था में इलाज चल रहा हैं। बीते एक महीने से ऐसी ही खबरें उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद, आगरा, कासगंज आदि जिलों से भी आती रही हैँ। इन दोनों मामलों में कई समानताएं हैं। पहली तो यही कि डॉक्टरों के पास बुखार के कारणों का बारे में कुछ अनुमान हैं, लेकिन वे ठोस रूप से कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं। दूसरी यह कि आसपास के बड़े अस्पतालों में पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट (पीकू) और नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (नीकू) में बेड तब भर चुके थे, जब मौसमी बीमारी या वायरल फीवर से पीड़ित बच्चों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही थी। उत्तर प्रदेश में डेंगू से लेकर एक खास प्रकार के टायफॉयड के अनुमान लगाए गए।
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उधर बिहार के डॉक्टरों के अनुसार ‘पहली नजर में आरएस वायरस से बच्चों के बीमार होने की बात समझ में आई। लेकिन मुजफ्फरपुर पहुंची डॉक्टरों की एक टीम किसी खास निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी। यहां तक कि निपाह वायरस से संक्रमण की आशंका भी जताई गई और उसकी जांच का निर्णय लिया गया। खबरों के मुताबिक उत्तर बिहार के कई जिलों में स्थिति अभी भी खराब है। मसलन, मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज अस्पताल और केजरीवाल अस्पताल में बीते एक पखवाड़े में 2,500 से अधिक बच्चे इलाज के लिए पहुंचे। दोनों अस्पतालों में दो सौ से अधिक बच्चे भर्ती हैं। दरभंगा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में इसी अवधि में लगभग 2,300 बच्चों का इलाज किया गया। वहां 15 बच्चों की फीवर से मौत हो गई। स्थानीय चिकित्सकों ने इस बीमारी के चमकी बुखार या एईएस होने से इनकार किया है। तो सवाल है कि आखिर ये कौन सा बुखार है? बीमारी के इस तरह रहस्यमय बने रहना ही सबसे बड़ी चिंता की बात है। इससे जाहिर होता है कि ग्रामीण इलाकों में चिकित्सा व्यवस्था का क्या हाल है। और वहां के लोगों की सेहत की सरकारों को कितनी चिंता है। समस्या यह है कि जब देश में आम इनसान से सीधे जुड़े मुद्दे मीडिया विमर्श और राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में ना हों, तो लोगों की जान इसी तरह सस्ती बनी रहती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण लेकिन आज के भारत का यथार्थ है।