बहुत खराब और त्रासद है लिखना कि लखीमपुर की घटना ने यूपी में विपक्षी एकता की संभावना को और खत्म कर दिया है। योगी आदित्यनाथ अब भाजपा को मजे से वापिस चुनाव जीतवा देंगे! सियासी आंखों, भाव-भंगिमाओं का सत्य है कि लखीमपुर की घटना पर प्रिंयका गांधी की सक्रियता ने दूसरी विपक्षी पार्टीयों में जलन व खुन्नस पैदा की। मतलब यह चिढ कि कांग्रेस है कुछ नहीं और प्रियंका इतना बवाल बना दे रही है। संदेह नहीं की प्रियंका का तुरंत लखनऊ पहुचना, लखीमपुर की और जाते हुए रोके जाने पर पुलिस से बेध़डक बात, जिस कमरे में उन्हे रखा गया वहा सफाई के लिए झाडू लगाने के वीडियों और गंभीर भाव भंगिमा में बात करने, मीडिया को बाइट देने के घटनाक्रम से प्रिंयका गांधी की अखिल भारतीय पैमाने पर छाप छुटी है। तय माने इसका कांग्रेस को पंजाब में फायदा होगा। लखिमपुर में किसानों, सिख किसानों के साथ जो हुआ उससे दुनिया भर में सिख आबादी को मैसेज गया है तो वही पंजाब, यूपी व हरियाणा के किसानों ने भी क्या ठानी होगी, इसका अनुमान लगा सकते है। uttar pradesh assembly election
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बावजूद इसके उत्तरप्रदेश में कांग्रेस है कहां जो प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में वह प्रियंका गांधी के बूते वोट पका सके? मगर हां, समाजवादी पार्टी और प्रियंका गांधी अब यूपी में एक और एक ग्यारह हो सकते है लेकिन होंगे नहीं। दोनों यदि मिलकर चुनाव लड़े और लोकदल, आप व छोटे दलों से भी प्रत्यक्ष-प्ररोक्ष चुनावी तालमेल बना ले तो भाजपा का हारना नामुमकिन नहीं है। मतलब अखिलेश यादव विधानसभा की 403 चुनावी सीटों में से सवा सौ-डेढ सौ सीटे बांट कर (खुद पौने तीन सौ सीटों पर लड़े जो कम नहीं है) एलांयस में चुनाव लड़े तो योगी सरकार को हराना गारंटीशुदा है। लेकिन अब एक तो कांग्रेस जबरदस्ती ज्यादा सीटे मांगेगी, दूसरे अखिलेश यादव के कांग्रेस से पिछले चुनाव के अनुभव, बिहार में तेजस्वी एलांयस में कांग्रेस की अधिक सीटों से खराब परफोरमेंस और प्रियंका गांधी के आगे की असहजता से एलांयस बन सकना असंभव सा है। कांग्रेस महज बुलबुला है यह सोचते हुए समाजवादी पार्टी, लोकदल और आप एलायंस की जरूरत को गंभीरता से नहीं लेंगे।
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तभी यूपी में नतीजा वहीं आएगा जो इस सप्ताह गुजरात के गांधीनगर शहर में आया है। यहां के लोकल चुनाव में कांग्रेस और आप ने एक-दूसरे के वोट काट कर भाजपा को छप्पर फाड़ बहुमत से जीताया। तय माने यूपी में सपा-लोकदल का एलायंस अलग लड़ेगा। बसपा अलग लड़ेगी। औवेसी और छोटी पार्टियों का एलायंस अलग लड़ेगा तो कांग्रेस अलग लड़ेगी। आप पार्टी अलग लड़ेगी। और विपक्ष के इन पांच सूमहों के अलग- अवग चुनाव ल़ड, आपस में वोट काटने से योगी मजे से ढाई सौ से पौने तीन सौ सीटे जीत कर वापिस मुख्यमंत्री बनेंगे।
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हां, लखीमपुर की घटना के बाद यूपी में चुनाव अब योगी का हो गया है। किसानों के साथ अकेले जिस फुर्ती से योगी ने समझौता पटाया और संगठन या दिल्ली की कोई कमान नहीं बनने दी तो उत्तरप्रदेश के आगामी चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी हो या अमित शाह या संगठन नेता, सबकी भूमिका गेस्ट कलाकार वाली होगी। योगी ही अपनी तह विधायकों के टिकट तय कराएंगे, विरोधियों के टिकट कटवाएंगे। इसलिए कि योगी के पास दलील है कि केंद्र सरकार की नीतियों- रीति-नीति से किसान व लोग नाराज है। महंगाई, बेरोजगारी, किसान आंदोलन सबमें योगी का क्या मतलब? वे प्रदेश के हिंदुओं को बचाए हुए है और हिंदु धर्मगुरू हैं तो चुनाव जीतना उनके बूते होगा या केंद्र सरकार के बूते। तय माने ज्यों-ज्यों चुनाव निकट आएंगे, योगी आदित्यनाथ का हिंदू शोर भी बढेगा और हिंदु-मुस्लिम भी होगा जबकि विपक्ष आपस में लड़ता हुआ।