सन्त कबीर नगर – रिपोर्ट जीएल वेदांती :-धार्मिक पर्व हो या सांस्कृतिक या फिर देशभक्ति का पर्व हो । सभी पर्वों की अपनी खासियत होती है पहचान होती है जीवन देश समाज के प्रति कृतज्ञता के सद्विचार होते है । पटल पर उतरने के पृष्ठिभूमि होते है । बावजूद जिन्दगी के आयाम उस उलझे हुए झाड़ – झंखाड़ की तरह है जिसमे फंसने वाला बड़ी मुश्किल से निकल पाता है । यह और बात है कि सानिंध्य प्राप्ति के परिपक्व उदाहरणो का दर्शन धार्मिक ग्रंथो एवं अच्छी पुस्तको मे किया जाता है । मसलन एक बकरियो का झुण्ड जंगल मे चारा चरने गया था । देर शाम को उनकी वापिसी मे एक बकरी झाड़ मे उलझ गयी जब – तक वह निकल पाती तब तक झुण्ड काफी दूर निकल गया होता है । भटकते हुए बकरी नदी के किनारे पहुंच कर वहां की रेतीली जमीन पर उकरी शेर के पंजे के निशान के पास बैठ जाती है । कुछ देर बाद एक – एक करके जंगली जानवर आते है और पूछते है तू यहां किसके सहारे बैठी है तुझे डर नही लगता है । जवाब मे बकरी शेर के पंजे की तरफ इशारा करती है जिसे देख सबके सब ये सोच कर भाग जाते है कि ये शेर का शिकार है इसे खाना मतलब अपनी मौत है । अन्त मे पंजे का निशान वाला शेर आता है और पूछता है इस खतरनाक जगह पर तू किसके सहारे बैठी है तुझे डर नही लगता है कि हम जंगली जानवर खा जायेगे । जवाब मे पूर्व की भांति बकरी शेर के पंजे की तरफ इशारा करती है पंजे का निशान देख शेर सोचता है कि ये तो हमारे ही सहारे बैठी है अतः इसे खाना ठीक नही है और हाथी को बुलाता है हाथी आती है और उसके पीठ पर बैठकर वह बकरी पेड़ के ऊपर टहनी का पत्ता खाती है जिसे बहुत ही मार्मिक शब्दो मे यू कहा गया है ” खोज पकड़ सैठे रहो धनी मिलेगे आय । अजया गज मस्तक चढ़े निर्भय कोपल खाय ॥ यह एक आध्यात्मिक उपदेश है इसका सारांश ईश्वर के आश्रित होना और भक्ति करना है । ऐसे तमाम उदाहरण समाज के प्रति देश के प्रति होता है । पर्वों का उद्देश्य भी यही होता है लेकिन क्या उसका अनुसरण किया जा रहा है ?
