मुख्यधारा की पारंपरिक मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक में कांग्रेस की राजनीति का मजाक बन रहा है। कांग्रेस पार्टी और उसका नेतृत्व चौतरफा निशाने पर है। निशाना ऐसा है कि अंग्रेजी के एक राष्ट्रीय चैनल की बेहद अनुभवी महिला पत्रकार ने लाइव शो में राहुल गांधी को गाली दे दी। हालांकि बाद में उन्होंने माफी मांगी लेकिन इससे अंदाजा लगता है कि कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व को लेकर क्या सोचा जा रहा है। congress party politics crisis
लेकिन क्या यह हकीकत नहीं है कि पार्टियां जब विपक्ष में रहती हैं तो उनके यहां राजनीति वैसी ही होती है, जैसी अभी कांग्रेस में हो रही है? क्या 2004 से 2014 के बीच 10 साल तक जब भाजपा विपक्ष में थी और उसका नेतृत्व कमजोर हुआ था तो वहां भी ऐसा ही नहीं हो रहा था, जैसा कांग्रेस में हो रहा है? असल में इस देश के लोगों की याद्दाश्त बहुत कमजोर है। नागरिक, नेता, मीडिया सब पिछली बातें भूल जाते हैं। कम से कम निकट अतीत के राजनीतिक इतिहास का जरूर ध्यान रखना चाहिए क्योंकि वहीं इतिहास आगे चल कर त्रासदी के रूप में या तमाशे के रूप में दोहराया जाता है। इतिहास को याद रखने वाले त्रासदी और तमाशे दोनों से बच जाते हैं।
सात साल से विपक्ष में बैठी कांग्रेस की मौजूदा राजनीति के बहाने यह देखने का समय है कि जब भाजपा विपक्ष में थी तो उसके यहां क्या हो रहा था और कैसे उसके शीर्ष नेतृत्व के रसातल में जाने के बाद एक मजबूत नेतृत्व उभरने का रास्ता बना। कह सकते हैं कि विपक्ष में रहते भाजपा के साथ जो हुआ वहीं इतिहास इस समय कांग्रेस में दोहराया जा रहा है। विपक्ष में रहते भाजपा कई बार टूटी और कई बड़े नेता पार्टी छोड़ कर गए। वहीं आज कांग्रेस के साथ हो रहा है। कहीं पार्टी टूट रही है, कहीं नेता पार्टी छोड़ कर जा रहे हैं, कहीं पार्टी चुनाव हार रही है, कहीं कोई नेता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर हमला कर रहा है तो कहीं सत्तारूढ़ दल मजाक उड़ा रहा है। मीडिया भी सरकार की बजाय सारी कमी विपक्ष में निकाल रहा है और आम जनता सारी मुश्किलों के बावजूद इस दुविधा में है कि करें तो क्या करें!
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विपक्ष में भाजपा के 10 साल बनाम कांग्रेस के सात साल की तुलना की शुरुआत 2004 के चुनाव के तुरंत बाद से शुरू करनी होगी। भाजपा ने फीलगुड और शाइनिंग इंडिया के नारे पर चुनाव लड़ा था और देश के सारे ज्योतिष यह भविष्यवाणी कर चुके थे कि अटल बिहारी वाजपेयी ही प्रधानमंत्री बनेंगे और जिंदा रहने तक पद पर रहेंगे। लेकिन वाजपेयी की कमान में भाजपा चुनाव हार गई। वाजपेयी खुद चुनाव जीते थे लेकिन वे पूरी तरह से हाशिए में चले गए। उनकी जगह लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी की कमान संभाली थी। आडवाणी के कमान संभालने के तुरंत बाद क्या-क्या हुआ था वह नेताओं और पत्रकारों की मौजूदा पीढ़ी की स्मृतियों में होगा। लेकिन कोई उसे याद नहीं करता है।
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भाजपा के विपक्ष में जाने के बाद पहला संकट मध्य प्रदेश का आया था। दो-तिहाई बहुमत के साथ जीतीं उमा भारती को एक आपराधिक मुकदमे के नाम पर पद से हटाया गया और उन्होंने भाजपा तोड़ कर अलग भारतीय जनशक्ति पार्टी बनाई थी। भाजपा के विपक्ष में आने के ठीक दो साल अप्रैल 2006 में उमा भारती ने यह पार्टी बनाई थी। अभी तक कांग्रेस में यह देखने को नहीं मिला है कि किसी नेता ने मुंह पर राहुल गांधी के साथ बदतमीजी की और उनको अपमानित किया। लेकिन उमा भारती ने भरी सभा में लालकृष्ण आडवाणी से बदतमीजी की और उनको अपमानित करके बाहर निकल गई थीं।
भाजपा से अलग होकर उमा भारती के पार्टी बनाने के ठीक पांच महीने बाद सितंबर 2006 में झारखंड में भाजपा टूटी। मुख्यमंत्री पद से हटाए गए बाबूलाल मरांडी ने भाजपा से अलग होकर अपनी पार्टी झारखंड विकास मोर्चा का गठन किया। भाजपा से अलग होने वाले तीसरे बड़े नेता कल्याण सिंह थे, जिन्होंने 2009 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा छोड़ दी और निर्दलीय लोकसभा का चुनाव लड़ा। भाजपा ने 2009 का लोकसभा चुनाव लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बना कर लड़ा था, जिसमें भाजपा तो हारी ही, कांग्रेस को पहले से ज्यादा बड़ा बहुमत मिला। इसके तीन साल बाद भारतीय जनता पार्टी कर्नाटक में टूटी। दिसंबर 2012 में भाजपा के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने भाजपा तोड़ कर कर्नाटक जनता पार्टी का गठन किया। उनकी इस पार्टी की वजह से ही भाजपा 2012 का विधानसभा चुनाव हारी और पूर्ण बहुमत की कांग्रेस की सरकार बनी। इलेक्ट्रोनिक मीडिया के नए-नए एंकर्स को छोड़ दें तो आज कांग्रेस की बदहाली आठ-आठ आंसू बहा रहे बाकी पुराने पत्रकार राज्यों में भाजपा के टूटने और हारने का इतिहास जानते हैं लेकिन वे भी कांग्रेस के संकट को ऐसा दिखा रहे हैं, जैसे पहली बार किसी पार्टी के साथ ऐसा हो रहा है।
बहरहाल, राज्यों में नेताओं के पार्टी छोड़ने, पार्टी टूटने और चुनाव हारने के इतिहास के अलावा भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर और वैचारिक रूप से भी बुरी तरह से बिखरी थी। लोग इस बात को याद नहीं करते कि कैसे भाजपा के विपक्ष में आने के तुरंत बाद लालकृष्ण आडवाणी पाकिस्तान की यात्रा पर गए थे और मोहम्मद अली जिन्ना की मजार पर जाकर जिन्ना को सेकुलर नेता घोषित किए थे। उसके बाद भाजपा और आरएसएस में कैसी जंग छिड़ी थी वह भारतीय राजनीति का एक अध्याय है। तब बहुत बेआबरू होकर आडवाणी पार्टी अध्यक्ष से हटाए गए थे और राजनाथ सिंह ने पार्टी की कमान संभाली थी। कांग्रेस के नाराज नेताओं के जी-23 की राजनीति पर चटखारे लेने वाले ज्यादातर लोगों को या तो जानकारी नहीं है या वे अपनी सुविधा से यह भूल गए हैं कि राजनाथ सिंह के कार्यकाल में आडवाणी के करीब नेताओं के समूह डी-फोर ने उनके लिए कैसी कैसी मुश्किलें खड़ी की थीं। यह तो बहुत निकट अतीत की घटना है कि कैसे नितिन गडकरी को अध्यक्ष का दूसरा कार्यकाल न मिले उसके लिए पार्टी के अंदर साजिश रची गई। नरेंद्र मोदी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनने से रोकने के लिए पार्टी के गोवा अधिवेशन में जो नाटक हुआ वह भी ज्यादा पुरानी बात नहीं है। कैसे विवाद हुआ, कैसे सुषमा स्वराज मीटिंग छोड़ कर दिल्ली लौटीं, कैसे बैठक के दौरान एसएस अहलुवालिया और स्मृति ईरानी का झगड़ा हुआ इस तरह की तमाम बातें बड़े सुविधाजनक तरीके से भुला दी गई हैं।
यह इतिहास याद दिलाने का मकसद इतना भर है कि पार्टी के आंतरिक झगड़े, नेताओं का नाराज होना, पार्टी छोड़ना या पार्टियों का टूटना स्वाभाविक राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है। चुनावी हार जीत भी राजनीति का अनिवार्य हिस्सा है। इसलिए सिर्फ इस आधार पर किसी के नेतृत्व का आकलन उचित नहीं है। लोकप्रिय और चुनाव जीतने वाले करिश्माई नेताओं को छोड़ दें तो इस देश के जितने भी बड़े और व्यापक समझ वाले, संगठन में माहिर और मौलिक विचार वाले नेता हुए वे ज्यादातर टूटती-बिखरती छोटी-छोटी समाजवादी या वामपंथी पार्टियों से निकले थे। अगर कोई नेता पार्टी छोड़ देता है या पार्टी तोड़ देता है तो यह उस नेता के आचरण पर सवाल है। इस आधार पर पार्टी के नेतृत्व का आकलन नहीं किया जा सकता है। और जहां तक आंतरिक मतभेद का सवाल है तो वह पार्टी के अंदर जीवंत लोकतंत्र का सबूत होता है। जहां कोई वैचारिक मतभेद नहीं है, सांगठनिक विवाद नहीं है, सब अनुशासन में बंधे दिख रहे हैं तो इसका मतलब है कि वहां लोकतंत्र खत्म हो चुका है और पार्टी पर एक नेता या नेताओं के एक समूह का एकाधिकार हो गया है।