इतिहास से सीख न लेकर आज भी जातियों में बंटा है मुस्लिम
समाज- अब्दुल सलाम (सलाम)
संत कबीर नगर / कुरैश अहमद सिद्दीकी
उक्त बातें प्रेस नोट के माध्यम से
सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल सलाम (सलाम) ने कहीं
श्री सलाम ने मुसलमानों की हालात पर इतिहास का हवाला देते हुए आगे कहा कि
1857 का वर्ष भारत के इतिहास में 1947 को छोड़कर पिछले 1000 वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण वर्ष है, क्योंकि यही वह साल है जब अंग्रेजों के चंगुल से देश को आजाद कराने का पहला बड़ा प्रयास किया गया था ।
यह वर्ष इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसी साल भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का समापन कर दिया गया था, और भारत का शासन इस वर्ष के बाद से ब्रिटिश हुकूमत के हाथ में चला गया था जो कहने के लिए ब्रिटिश राजा के हाथ में था मगर वास्तव में वहां की चुनी हुई सरकार भारत का शासन चलाती थी ।
1857 में स्वतंत्रता का यह प्रयास वास्तव में मुसलमानों की तरफ से किया गया था, जिसमें हमारे हिंदू भाइयों ने भी सहयोग दिया और इस संघर्ष में हजारो उलेमाओं एवं मुसलमानो को मौत के घाट अंग्रेजी सेना ने उतार दिया था।
क्योंकि अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद का फतवा एक मशहूर आलिम ए दीन (अल्लामा फजले हक खैराबादी) ने दिया था, इसलिए मुसलमानों ने बढ़-चढ़कर इस संघर्ष में हिस्सा लिया था, अंग्रेजो के खिलाफ जिहाद (संघर्ष) का बिगुल 10 मई 1857 को बख्त खान के नेतृत्व मे मेरठ से शुरू हुआ ।।
सितम्बर 1857 मे दिल्ली मे बादशाह ए हिन्द बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर रंगून भेजने और उनके दोनो बेटों का सिर कलम करने की घटनाओं के साथ समाप्त हुआ, अंन्तत: आजादी का यह प्रयास असफल सिद्ध हुआ।
अंग्रेजों का मानना था कि यह विद्रोह मुसलमानों ने किया है, इसलिए उस समय के सभी संपन्न मुसलमानों की संपत्तियां ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रतिनिधि अधिकारियों(तत्कालीन शासकों) ने जब्त करली थी, जो फिर कभी वापस नहीं हुई ।।
समझने की बात है उस समय कौन से मुसलमान रहे होंगे जिनकी संपत्ति जब्त हुई होंगी ?
माना जा सकता है कि वह मुस्लिम समाज का “अगड़ा तबका” समझे जाने वाला वर्ग रहा होगा क्योंकि इसी के पास संपत्ति और स्थानीय शासन सत्ता या शक्तियां थीं, लेकिन सभी संपत्तियां छीन कर इसे सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया गया था !!
उदाहरण के लिए- भारत के उन सभी हिस्सों को देख सकते हैं जहां जहां पर यह संघर्ष हुआ था, उन्हीं मे से एक जाना पहचाना उदाहरण बस्ती जिले के बहादुरपुर ब्लाक के गांव महुआ डाबर का हाल आज भी मय गवाह देख सकते हैं ।।
पठानों के इस पूरे गाँव को अंग्रेजो ने आग के हवाले कर दिया था, गांव छोड़कर भाग रहे लोगों को जो कि मुसलमान ही थे आग में झोंक दिया गया था, चल सम्पत्ति अंग्रेज स्वयं ले लेते थे, और अचल सम्पत्ति अपने गैर मुस्लिम चाटुकारो को दे देते थे।
“पिछड़े तबके” का समझे जाने वाले मुसलमान भाई के पास तो थोड़ा-बहुत कुछ सम्पत्ति जरूर बची रही होगी, क्योंकि इनकी जब्ती नही हुई थी !!
1857 के बरस के बाद तथाकथित “अगड़े तबके” ने अपनी मेहनत और संघर्षों से फिर से धन-सम्पदा बनाई।
लेकिन 1947 तक शासन अंग्रेजों के हाथ मे रहा ।
आज सभी तबके के मुसलमानों की सामाजिक आर्थिक स्थिति लगभग एक सी है ।
लेकिन कुछ जातिवाद और बिरादरी बाद फैलाकर कुछ लोग मुसलमानों के अंदर अपने लिए राजनीति का एक राजनीतिक सफलता का रास्ता तलाश कर रहे हैं।
निश्चित रूप से ऐसे लोग सभी तबके के मुसलमानों की आर्थिक सामाजिक स्थिति से परिचित नहीं है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने तो कहा था कि भारत के मुसलमानों की स्थिति दलितों से भी बदतर है लेकिन इसी में आप जब जातिवाद बिरादरीवाद फैलाकर बटवारा करेंगे तब शायद स्थिति और भी बदतर हो जाएगी, जमाने से हम पढ़ते सुनते चले आ रहे हैं कि इत्तेहाद (एकता) में ही ताकत है और उस एकता को मुसलमानों को बनाने की जरूरत है कि सभी मुसलमान सामाजिक-राजनीतिक रूप से एक हो जाएं, और विशेष करके शिक्षा पर ध्यान दें ।
किसी भी तबके का मुसलमान हो जिसने शिक्षा को अपना हथियार बना लिया है वह जरूर सफल हुआ है चाहे उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री अहमद हसन (अंसारी) साहब रहे हों, जो कि एक आईपीएस अधिकारी रहे हैं, हामिद अंसारी (पूर्व उपराष्ट्रपति) सांसद अफजाल अंसारी (मऊ) का घराना हो या किसी अन्य जाति बिरादरी का कोई भी और घराना हो, जिसने भी शिक्षा की राह पकड़ी वही सफल हुआ और मजबूत हुआ ।।
सभी मुसलमानों से अपील है कि जाति बिरादरी के बंटवारे में ना फंसे!
शिक्षा (तालीम) की राह पकड़ें और अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को मजबूत करें !
शिक्षा ही वह माध्यम है जिससे भविष्य सुनहरा होगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी ससम्मान जीवनयापन का साधन होगा !!