सेकुलर दलों को AIMIM से गठबंधन करने से परहेज कियूं – अब्दुस्सलाम खान
संत कबीर नगर – कुरैश अहमद सिद्दीकी

उक्त बातें मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) पार्टी के पूर्व मीडिया प्रभारी अब्दुस्सलाम खान ने प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से कही।
श्री अब्दुस्सलाम ने प्रदेश में अपने आप को सेकुलर कहने वाले अन्य दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि भले ही भाजपा के इशारे पर बहुजन समाज पार्टी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में अभी तक, किसी भी गठबंधन से इनकार किया हो लेकिन हाल ही के दिनों में देखा गया है कि ‘आन-कैमरा दो बार उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा के समर्थन का इशारा भी दिया है।
विदित हो कि अभी कुछ दिनों पूर्व ही एक टी.वी. चैनल पर aimim के राष्ट्रीय प्रवक्ता सैयद आसिम वकार साहब ने उत्तर प्रदेश में, अगर मुख्यमंत्री नहीं तो कम से कम उपमुख्यमंत्री का पद मुसलमानों को मिलने की बात कही है !
जिस सूबे में 20% मुस्लिम आबादी हो वहां ऐसे बयानों को नजरअंदाज करना किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए स्वयं को ‘सूबे की मुख्य राजनीतिक धारा से अलग’ करना साबित होगा ।
बहुजन समाज पार्टी शांति से बैठ कर एक ‘मूकदर्शक की भूमिका में’ इस समय उत्तर प्रदेश की राजनीति पर नजर बनाए हुए है। बसपा प्रमुख को भारतीय जनता पार्टी के साथ जाने की कुछ निजी मजबूरी भी हो सकती है इसलिए वह इस राजनीतिक हलचल से अपने को दूर किए हुए हैं।
जाहिर सी बात है विगत चुनावों की तरह इस बार उत्तर प्रदेश का चुनाव साधारण नहीं होगा !!
क्योंकि ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन की मजबूत दस्तक और बैरिस्टर असदुद्दीन ओवैसी की सभाओं में उमड़ता जनसैलाब राजनीतिक हाशिए पर चल रहे मुसलमानों के जेहन में परम्परागत वोटर बनने से अलग एक नये बदलाव की चाहत लिए साफ संकेत है।
यह जनसैलाब अब अपनी हिस्सेदारी के लिए जागरूकता के रास्ते पर चलता हुआ दिखाई दे रहा है, मानो कि यह जनसैलाब कह रहा हो कि अब हमें हमारा राजनीतिक हक चाहिए, हमें शासन-प्रशासन में हिस्सेदारी चाहिए, हम दशकों से उत्पीड़न के शिकार रहे हैं, राजनीतिक शोषण के शिकार हैं, हमें इंसाफ चाहिए, हम इस देश के बागबान रहे हैं, हमें समुचित सम्मान चाहिए, हमारा राजनीतिक इस्तेमाल और शोषण अब बीते हुए कल की बात बने, हम अब अपनी हिस्सेदारी ले कर रहेंगे ।।
चूंकि हम बात उत्तर प्रदेश की कर रहे हैं और यहां के राजनीति में मुसलमानों की संख्या और योगदान के ऊपर एक नजर डाल लेना राजनीतिक गुणा-गणित को समझने के लिए आसान होगा ।।
ध्यान देने की बात यह है कि उत्तर प्रदेश के कुल 403 सीटों में से 143 सीटें ऐसी हैं जहां मुसलमान निर्णायक की भूमिका में है, और 73 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी 30% से अधिक है ।
यद्यपि मुसलमान आबादी की नुमाइंदगी सूबे की सभी 403 विधानसभा सीटों पर है, मगर 107 सीटें (20% से 30% या अधिक आबादी वाली) ऐसी हैं जहां जीत की इबारत मुसलमान ही लिखता है, इनमें से अधिकांश सीटें पश्चिमी उत्तर प्रदेश और तराई क्षेत्र के जिलों में पड़ती हैं । इसमें से कुछ सीटें पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिलों में से भी हैं ।।
जाहिर सी बात है सरकार बनाने के लिए 202 सीटों की दरकार होगी और इन 202 सीटों को प्राप्त करने में जिस समुदाय का वोट संगठित होने पर 107 सीटें जीती जा सकती हैं, उसको उत्तर प्रदेश या किसी भी प्रदेश की राजनीति में नजरअंदाज कर देना राजनीतिक आत्महत्या करने जैसा होगा।
ऐसी स्थिति मे कोई भी राजनीतिक पार्टी मुसलमानों को नजरअंदाज नहीं कर सकती।
स्पष्ट है कि अखिलेश यादव का दो बार aimim से गठबंधन का इशारा और बहुजन समाज पार्टी की चुप्पी आगामी कुछ महीनों या दिनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम की तरफ इशारा करते हैं ।