सोशल मीडिया पर आपकी निजता कितनी खतरे में?
रूबी सिंह
आज के समय में सोशल मीडिया हमारी जिंदगी का एक हिस्सा बन चुका है। जिसके बिना जीने की हम उम्मीद भी नहीं कर सकते। अगर हम कुछ समय सोशल मीडिया का यूज ना करें तो हमें ऐसा लगता है, कि हमने अपनी लाइफ में कुछ मिस कर दिया। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो पल भर के लिए भी सोशल मीडिया से दूर नहीं रह सकते। पूरी तरह से ही सोशल मीडिया पर डिपेंड हैं। हालांकि किसी से मिलते ही हम वो जैसा है उसकी जगह जैसा चाहिए बनाने में लग जाते हैं। बदलने की जीत में हम खुद को भूलते ही जा रहे हैं। जो जैसा है, उसे उसी की तरह होना, रिश्तो को तनाव से बचाने के लिए टॉनिक का काम करता है। सोशल मीडिया के बढ़ते क्रेज से युवाओं में भारतीय संस्कृति की भी कमी देखने को मिल रही है। युवाओं में रहन-सहन से लेकर परिवार के लिए आदर सम्मान सब कम होता जा रहा है। फिलहाल देश दुनिया में आए दिन कुछ न कुछ घटनाएं घटित होती रहती हैं और सोशल मीडिया के जरिए यह सभी जगह फैलती है। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर बहुत संवेदनशील मुद्दे पर बयानबाजी करने से युवाओं को रोका जाता है। ताकि उनकी नादानी किसी बड़े मुद्दे को न भड़का दे। सोशल नेटवर्किंग साइट्स के माध्यम से तमाम अश्लील सामग्री और भड़काऊ बातें भी लोगों तक प्रसारित की जा रही हैं। जो लोगों के दिमाग पर बुरा प्रभाव डालते हैं इसकी वजह से देश में दंगा फसाद में वृद्धि हुई है। सोशल नेटवर्किंग साइट ने लोगों के वास्तविक जीवन को भूलाकर अभासी जीवन में रहने को मजबूर कर दिया है। चूंकि सोशल मीडिया का उपयोग सभी को करना चाहिए पर इसकी एक समय सीमा जरूर तय करनी चाहिए। अक्सर लोग अपनी भावनाएं सोशल मीडिया पर व्यक्त करते हैं। लेकिन उस पर सिर्फ कमेंट के सिवा कुछ नहीं मिलता। अगर आप परिवार और दोस्तों से अपनी भावनाएं साझा करेंगे तो अब जल्द ही उबर जाएंगे बुरे दौर से। युवाओं को तो सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट का नशा सा हो गया है। सोशल साइट पर कई बार स्टेटस अपडेट करना, घंटों तक दोस्तों से चैटिंग करना, जैसी आदततो ने युवा पीढ़ी को काफी हद तक प्रभावित किया है। घंटों तक ट्विटर और फेसबुक जैसी वेबसाइट पर समय बिताने से न केवल उनकी पढ़ाई पर असर पड़ा है। बल्कि धीरे-धीरे कुछ नया करने की रचनात्मकता भी खत्म हो रही है।
दरअसल हमें अपने नजदीक कुछ ऐसे लोगों को रखना जरूरी है। जो हमारी बातें हमेशा सुनने के लिए हो। जिन्हें हम स्वयं स्नेह कर सकें, इनसे कुछ नहीं छुपाए। यही हमारी जिंदगी के असली “एंटीवायरस” है। जैसे स्मार्टफोन, लैपटॉप को वायरस अटैक से बचाने के लिए एंटीवायरस की जरूरत होती है। ठीक वैसे ही हमें अपनी जिंदगी को बचाने के लिए एक एंटीवायरस चाहिए। आपके एंटीवायरस कौन है? अगर नहीं है तो जल्दी ही इसकी पहचान कीजिए और अपने लाइफ का एंटीवायरस ढूंढिए, जब तक मिल ना जाए। अगर आपके पास आपका एंटीवायरस है तो सोशल मीडिया पर अपने भावनाओं को शेयर करने की जगह उनसे करिए। शायद वो आपकी कोई मदद कर सके और आप जिस भावनाओं में फंसे हुए हैं उससे आपको बाहर निकाल सके।